आख़िर क्यों किसान बनने से बेहतर मज़दूर बनना समझने लगे हैं देश के युवा?
चंंद्रशेखर कुमार, युवा कवि और स्वतंत्र लेखक

सरकार के हस्तक्षेप के बाद अंतत: तमिलनाडु से आये किसानो ने जंतर मंतर पर चल रहे प्रदर्शन को समाप्त कर दिया। जिस प्रकार उन्होंने पेशाब पीकर व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश जताया, वह स्तब्ध करने वाला था। उनके पेशाब पीने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुईं। इससे भी बढ़कर वे मैला खाने की चेतावनी दे रहे थे। सवाल उठता है कि किसानों ने यह कदम क्यों उठाया? और किस प्रकार उनके आंदोलन के बहाने सियासी पार्टियां सियासत करती नजर आयीं?

दरअसल, किसानों की जो समस्या है, वह नई नहीं है। आज़ादी के समय से ही किसान वर्ग बदहाली में जी रहा है। प्रश्न यह है कि जो किसान पूरे देश का पेट भरता है, उसका पेट हम क्यों नहीं भर पाते? तमिलनाडु से दिल्ली आए किसान कर्ज़माफ़ी को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे। इसका मतलब साफ़ है कि स्वाधीन हुए 70 साल गुज़र जाने के बावजूद कृषि का बुनियादी ढाँचा भारत में इतना कमज़ोर है कि किसान को कर्ज़ लेने की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन उसे चुका पाने की स्थिति में भी वे नहीं होते हैं।

भारतीय कृषि का रूप गहन जीवन निर्वहन कृषि है। मतलब भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ की लगभग 65 प्रतिशत आबादी कृषि कार्य से जुड़ी हुई है। फिर भी सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान मात्र 15 प्रतिशत ही है। किसानों की दयनीय स्थिति के लिए हमारी व्यवस्था भी दोषी है। यही वह स्थिति है, जब एक किसान पलायन करके हमारे देश के विभिन्न शहरों में मज़दूर बनने को विवश हो जाता है।

बहरहाल, जिस कर्ज़माफ़ी को लेकर आंदोलन चल रहा था, मैं उसके ख़िलाफ़ हूँ। कर्ज़माफ़ी तात्कालिक सामाधान हो सकता है, सर्वकालिक नहीं। कर्ज़माफ़ी के बजाय किसानों की बुनियादी सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए। मसलन खाद , बीज, जोताई, न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे बिन्दु हैं, जिनपर सरकार को सोचना चाहिए। भारत वही देश है, जहां के किसान चौधरी चरण सिंह किसानी करते-करते प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे थे, परंतु वतर्मान परिप्रेक्ष्य को देखकर मन क्षुब्ध होता है।

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम होना चाहिए। जिस टमाटर की कीमत अभी बाजार में 10- 15 रूपये किलो है, वही टमाटर किसानों के खेत से 2-5 रूपये किलो बिक रहा है। समस्या यही है। किसानों के खेत से बाज़ार जाते-जाते चीज़ों की कीमतें आसमान छू जाती हैं। क्या कोई ऐसी व्यवस्था है, जिसके द्वारा बिचौलिए का तंत्र खत्म हो सके, शहर और गाँव के बीच की दूरी पट सके, न्यूनतम समर्थन मूल्य और उच्चतम शहरी रेट में संतुलन कायम हो सके। कर्ज़माफ़ी के बजाय गाँवों में सरकार को गोदाम या बफ़र स्टॉक केन्द खोलने पर ध्यान देना होगा।

सरकार के पास स्पष्ट विज़न होना चाहिए। देश का जवान शहीद होता है, तो उसके परिवार को काफी पैसे मिलते हैं, नौकरी मिलती है और मिलनी भी चाहिए, किंतु जब एक किसान मरता है, तो उसे क्या मिलता है? किसानों को हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है। उनके साथ यह भेदभाव क्यों है? अगर यही स्थिति रही, तो किसानी कौन करेगा? वैसे भी युवा पीढ़ी का किसानी से मोहभंग हो गया है। वे किसानी छोड़ मज़दूरी करना चाहते हैं।

मान लीजिए किसी किसान के पास दो बीघा ज़मीन है। उस ज़मीन में 6 महीना मेहनत करने पर मुश्किल से 60 मन (1 मन = 40 किलो) धान का उत्पादन होता है, लेकिन ख़र्च कितना होता है, अब इसे देखते हैं। जुताई में कम से कम 1600,  खाद में 1500,  रोपाई में 1500, केराई में 500 और कटाई में 1000 रूपया। इसके बाद धान को झाड़ने में खर्च पड़ेगा कम से कम 1000 रुपया। पटवन का ख़र्च छोड़ भी दें, तो कुल ख़र्च पड़ता है लगभग 7100 रूपया। यानी किसान के पूरे परिवार के श्रमदान के बावजूद इतना खर्च पड़ता है। लेकिन इनकम कितना होता है, ये देखिए। प्रति मन 500 रूपये मुश्किल से मिल पाते हैं। 60 मन का इनकम हुआ 30,000 रूपया। इस तीस हज़ार में ख़र्च हुए 7100 को घटाने पर कुल कमाई हुई 22,900 रूपये।

यानी देखा जाए, तो किसान के पूरे परिवार ने मिलकर संयुक्त रूप से श्रम करके 6 महीने में 23 हज़ार रुपये कमाए। प्रति महीना पूरे परिवार की कमाई हुई तकरीबन 4,000 रुपया। और तो और, समय पर बारिश न हुई, ओले और ख़राब मौसम की मार झेलनी पड़ी, तो किया हुआ सारा बेकार हो जाता है। सब कुछ पल में स्वाहा हो जाता है। अब आप ही निकालिए, उस परिवार की प्रति व्यक्ति आय। इसीलिए देश का युवा किसानी के बजाय मज़दूरी करना पसंद करने लगा है।

(उपरोक्त आंकड़े मेरे निजी अनुभव पर आधारित हैं- चंद्रशेखर कुमार)