
वो दिन दूर नहीं, जब एक लड़का एक लड़के को लेकर या एक लड़के के लिए (या एक लड़की एक लड़की को लेकर या एक लड़की के लिए) घर से भाग जाएगा। फिर मां-बाप थाने में उसको अगवा करने/बहकाने/फुसलाने जैसी रिपोर्ट लिखाएंगे। फिर कोर्ट में खड़ा होकर लड़का (या लड़की) बोल देगा कि मां-बाप हमारे प्यार के दुश्मन हैं। फिर कोर्ट में मां-बाप फ्रॉड सिद्ध हो जाएंगे। फिर मीडिया रिपोर्ट करेगा- “प्यार की जीत।”
समलैंगिकता को कानूनी मान्यता मिलने के बाद ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है और आप इन भावी ख़तरों से अपनी सुरक्षा के लिए कोई उपाय भी नहीं कर सकते, क्योंकि अपने घर-परिवार का चलन या व्यवस्था तय करने का अधिकार आपके पास नहीं है। आपके घर-परिवार के चलन और व्यवस्था को निर्धारित करेंगी भारत की अदालतें और उस तरह की विकृत मानसिकता वाले धंधेबाज़ लोग, जिनके आगे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने प्रगतिशीलता के नाम पर घुटने टेक दिए हैं।
इस फैसले के बाद मेरे मन में कई सवाल उठ खड़े हुए हैं-
(1) क्या 130 करोड़ लोगों के जीवन से जुड़े ऐसे मसले 5 लोग तय कर सकते हैं?
(2) क्या कोर्ट संविधान की व्याख्या करते-करते हज़ारों या लाखों वर्षों से चले आ रहे मानव-व्यवहार को भी प्रभावित करने का अधिकार रखते हैं?
(3) क्या कोर्ट आपराधिक मामलों को निपटाते-निपटाते समाज की संस्कृति, आदतें और व्यवहार भी इस हद तक जाकर तय कर सकते हैं?
(4) क्या समलैंगिकता केवल संवैधानिक या कानूनी प्रश्न है?
(5) क्या चंद लोगों के निहित स्वार्थ के लिए कोर्ट कोई ऐसा फैसला सुना सकता है, जिससे आने वाले वक्त में लाखों-करोड़ों लोगों की ज़िंदगी नरक बन सकती है?
(6) क्या कोर्ट को प्रकृति के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ जाकर काम करने का अधिकार दिया जा सकता है?
(7) क्या भारत के लिए अपनी संस्कृति कोई मुद्दा नहीं? क्या कानून अब भारत की संस्कृति की छाती पर चढ़कर भी राज करेंगे?
(8) क्या भारत जब तक अमेरिका की देखा-देखी नहीं चलने लगेगा, तब तक वह दुनिया में प्रगतिशील देश का दर्जा हासिल नहीं कर सकता?
अति-अमीर और अति-अंग्रेज़ हैं समलैंगिकता के समर्थक!
आज समलैंगिकता के साथ खड़े ज़्यादातर लोग या तो अति-अमीर हैं या अति-अंग्रेज़ीदां लोग हैं, जिनके लिए हवस ही प्रधान है और नैतिकता, मर्यादा या प्रकृति के बुनियादी सिद्धांतों का आदर शून्य है। इनके पास कितना पैसा है और इनके पीछे कितनी ताकतवर लॉबी है, इसका अंदाज़ा आपको कथित समलैंगिकों के जश्न और 7 सितंबर 2018 के अंग्रेज़ी अखबारों की रिपोर्टिंग को देखकर लग गया होगा।
हैरानी की बात ये है कि इन भारतीय अति-अमीरों और अति-अंग्रेज़ों जितने विकृत तो वे अंग्रेज़ भी नहीं थे, जिनके ख़िलाफ़ आंदोलन करके हमारे पूर्वजों ने उन्हें इस देश से खदेड़ दिया था। भारतीयों की नज़र में गंदे समझे जाने वे अंग्रेज़ भी इतने सभ्य और समझदार थे कि समलैंगिकता को अथवा इसे स्वीकृति देने से निकलने वाले परिणामों को ठीक नहीं समझते थे और इसीलिए इसके ख़िलाफ़ कानून बनाया।
हर व्यक्ति को सेक्स-ऑब्जेक्ट बना देंगे ये हवसी और सेक्स-व्यापारी!
भारतीय अंग्रेज़ों ने भारत के हर व्यक्ति को सेक्स ऑब्जेक्ट बना देने का संकल्प ले लिया है। उनके लिए सेक्स ही सब कुछ है। यह चाहे जैसे हो, जिस रूप में हो, जिससे हो। कल को ये भारतीय अंग्रेज़ दो बालिगों की सहमति के नाम पर इनसेस्ट सेक्स का अधिकार भी मांग सकते हैं। पिता-पुत्री, माता-पुत्र, भाई-बहन, भाई-भाई, बहन-बहन का अधिकार भी ये मांग सकते हैं। और हमारे देश का प्रगतिशील कोर्ट कह देगा कि जब दो बालिग सहमत हैं, तो इसमें अपराध कहां हुआ?
कल को ये भारतीय अंग्रेज़ जब इंसानों के साथ सेक्स करने से ऊब जाएंगे, तो जानवरों के साथ सेक्स का भी अधिकार मांग सकते हैं। ये कह देंगे कि कुछ विशेष जानवरों के प्रति सेक्स की भावना पैदा होना पूर्ण रूप से प्राकृतिक है। ये कह देंगे कि जब उन्हें मारकर खाया जा सकता है तो उनके साथ सेक्स क्यों नहीं किया जा सकता? इन हवसी इंसानों के सामने कोई मासूम जानवर तक सुरक्षित नहीं रह जाएगा।
हवस इनके लिए केवल तन की भूख मिटाने के लिए किसी भी हद तक चले जाने का नाम नहीं है। हवस इनके लिए बहुत बड़ा धंधा भी है। सेक्स-बाज़ार से ये काफी पैसा कमाते हैं, इसलिए इन्हें इस बाज़ार का और विस्तार चाहिए। समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दिलवाने में मुख्य रूप से सेक्स-व्यापारियों की लॉबी ही मुझे समझ में आती है।
इन हवसियों और सेक्स-व्यापारियों का जीवन सेक्स के ही इर्द-गिर्द घूमता है और कोर्ट इन्हें न बीमार मानता है, न गलत मानता है। उसे यह पता नहीं है कि हवस और व्यापारिक मानसिकता का कोई अंत नहीं होता। यह हवस ही है कि आदमी को दो साल की बच्चियों तक से रेप करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यह हवस ही है जिसकी वजह से लड़कियां समाज में कहीं भी किसी के भी सामने सुरक्षित नहीं रह गई हैं। यह हवस ही है, जिसके चलते राजा ययाति ने पूरी जवानी अय्याशी करने के बाद बुढ़ापे में अपने बेटे से जवानी मांग ली।
और यह व्यापार ही है जिसके चलते लाखों-करोड़ों बच्चियां और लड़कियां आज भी कोठे पर बिठाई हुई हैं। यह व्यापार ही है जिसके चलते आज हर बच्ची, हर लड़की पर गिद्धों की नज़र गड़ी हुई है। यह व्यापार ही है कि बालिका गृहों में भी हमारी बच्चियां सुरक्षित नहीं रह गई हैं। यह व्यापार ही है कि हर साल हज़ारों लड़के-लड़कियां ह्यूमेन ट्रैफिकिंग का शिकार हो रहे हैं। यह व्यापार ही है जिसमें अनेक लड़कियां मार भी दी जाती हैं, ताकि व्यापार के चलते रहने में कोई अड़चन न आए।
इन सेक्स-व्यापारियों और हवसियों की चालाकी तो देखिए, समाज में पहले से ही शोषण का शिकार हो रही लाखों-करोड़ों वेश्याओं के लिए उसके पास कोई प्रगतिशील सोच नहीं है कि कैसे इन्हें इस दलदल से बाहर निकाला जाए। उनकी सारी प्रगतिशीलता का अंत इस दलील पर जाकर हो जाता है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहना दिया जाए, ताकि बच्चियों और महिलाओं के शोषण का मार्ग और प्रशस्त हो जाए और सेक्स-व्यापारियों का धंधा और फले-फूले।
मैं हैरान हूं कि मेरे देश की अदालत इन हवसियो और सेक्स-व्यापारियों को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने के बजाय उन्हें अनियंत्रित छोड़कर प्रोत्साहन देने के रास्ते पर बढ़ चुकी है? समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता देने के बाद न सिर्फ़ उनके शादी-विवाह और बच्चे गोद लेने का प्रश्न उठेगा, बल्कि अगर समलैंगिक संबंध कानूनी हैं तो आपको इन चीजों की भी इजाज़त आज न कल देनी ही पड़ेगी।
संभावित जटिलताओं का सामना तैयार करने में सक्षम नहीं है हमारी न्याय व्यवस्था!
ज़रा सोचिए, कल को अगर समलैंगिकों को शादी करने की इजाज़त मिलने लगी, तो समाज किस तरफ जाएगा? स्त्री-पुरुष संबंधों और हमारी परिवार व्यवस्था पर इसका कितना ख़तरनाक असर पड़ेगा? और अगर समलैंगिकों को बच्चे गोद लेने की इजाज़त मिलने लगी, तो सोचिए उन बच्चों के साथ क्या-क्या हो सकता है? वे बच्चे बड़े होकर मुख्य धारा में शामिल होंगे या समलैंगिक और समलैंगिकता के प्रचारक बनेंगे?
यूं तो फैसले में यही कहा गया है कि दो “वयस्क” समलैंगिक अगर “सहमति” से संबंध बनाएंगे तो यह अपराध नहीं होगा, लेकिन क्या “वयस्क” और “सहमति” इन दो शब्दों में निहित पाबंदियों का पूरा-पूरा पालन सुनिश्चित कराया जाना इतना आसान है? क्या इस आज़ादी की आड़ में बड़े पैमाने पर इसका दुरुपयोग शुरू नहीं हो जाएगा?
अनेक लोग समलैंगिकता के समर्थन में दुनिया के कुछ देशों, खासकर अमेरिकी देशों का ज़िक्र करते हैं, लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था को अमेरिकी न्याय व्यवस्था के स्तर पर पहुंचने में अभी दशकों लगेंगे। भारतीय न्याय व्यवस्था अधिकांश मामलों में लोगों को न्याय दिलाने में सक्षम नहीं है, इसलिए यहां कानूनों और कानूनी अधिकारों का दुरुपयोग बहुत बड़े पैमाने पर होता है। भारत की अदालतों में 3.3 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें भी बहुत बड़ी संख्या 10 साल से भी अधिक समय से चल रहे मामलों की है।
समझना मुश्किल नहीं कि समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने से जो जटिलताएं पैदा होंगी, उसका सामना करने के लिए भारतीय न्याय व्यवस्था अभी सक्षम नहीं है। और इसीलिए भारत भी अभी अपने समाज में इस तरह के परिवर्तनों को स्वीकार नहीं कर सकता।
फैसले के निम्नलिखित दुष्परिणामों के अंदेशे मुझे सिहरा रहे हैं-
(1) इस फैसले से समाज में अनैतिकता, अराजकता और अप्राकृतिक किस्म के यौन अपराधों को बढ़ावा मिलेगा। मौजूदा विपरीत-लिंगी यौन अपराधों के मामलों में इन समलैंगिक अपराधों के जुड़ जाने से स्थिति और भयावह हो जाएगी।
(2) इससे समाज में समलैंगिकता का अप्राकृतिक चलन बढ़ेगा और समलैंगिक देह व्यापार का रैकेट भी फलेगा-फूलेगा। मुमकिन है कि आने वाले समय में समलैंगिकों के भी कोठे विकसित हो जाएं या फिर बड़े पैमाने पर एस्कॉर्ट सर्विसेज भी शुरू हो जाएं।
(3) समलैंगिक रिश्तों को कानूनी मान्यता मिलने के बाद से अब स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाले कच्ची उम्र के लड़के-लड़कियों पर समलैंगिक देह-व्यापार के गिद्धों की नज़र गड़ जाएगी और वे उन्हें बरगलाकर, ब्लैकमेल कर, डराकर, लालच देकर या ब्रेन वॉश करके उनकी सहमति लेने या उन्हें सहमत दिखाने और समलैंगिकता के नारकीय कारोबार में ढकेलने का प्रयास कर सकते हैं।
(4) अब तक समाज में अधिकांशतः महिलाओं पर पुरुष द्वारा बलात्कार की घटनाएं ही सामने आती रही हैं, लेकिन समलैंगिकता को लेकर इस नयी कानूनी स्थिति के बाद से पुरुषों द्वारा बच्चों और पुरुषों से एवं महिलाओं द्वारा बच्चियों और महिलाओं से बलात्कार के मामले भी सामने आ सकते हैं। यानी आने वाले समय में बलात्कारियों की लिस्ट में महिलाएं भी शामिल हो जाएं तो अचरज नहीं।
(5) मुमकिन है कि आने वाले दिनों में हम यह भी सुनें कि फलाने लड़के को वीडियो बनाकर या फोटो खींचकर लंबे समय से ब्लैकमेल किया जा रहा था। और तो और, लड़कियों के मामले में पहले से ही चले आ रहे ऐसे अपराधों की संख्या और बढ़ जाएगी, क्योंकि उनके साथ ऐसा अब सिर्फ़ हवसी पुरुष ही नहीं, हवसी महिलाएं भी कर सकती हैं।
(6) जब समलैंगिकता का रोग एक बार समाज के एक तबके को लग जाएगा, तो वह बालिग-नाबालिग और सहमति-असहमति नहीं देखेगा, जैसे कि आज रेपिस्ट मानसिकता के लोग लड़कियों के मामले में बालिग-नाबालिग और सहमति-असहमति नहीं देखने लगते।
(7) नियमित रूप से अपने पार्टनर बदलते रहने वाले धनाढ्य और अय्याश किस्म के स्त्री-पुरुष हवस के इस नए प्रयोग में गरीबों के बच्चे-बच्चियों और कच्ची उम्र के घरेलू नौकरों-नौकरानियों को भी अपना शिकार बना सकते हैं।
(8) देह-व्यापार के लिए अब तक अधिकांशतः बच्चियों और लड़कियों को ही अगवा किया जाता या खरीदा-बेचा जाता रहा है, लेकिन इस फैसले के बाद छोटे बच्चे और लड़कों के अगवा किए जाने और खरीदे-बेचे जाने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। मेल चाइल्ड ट्रैफिकिंग और मेल एडल्ट ट्रैफिकिंग के मामले स्थिति को और भयावह बना सकते हैं।
(9) जैसे आज प्रभावशाली और पैसे वाले बलात्कारी बलात्कार करके भी कानून के ढाल का ही इस्तेमाल करके बच जाते हैं, उसी तरह कल को समलैंगिक अपराधी भी कानून का इस्तेमाल करके बच जाया करेंगे। सहमति-असहमति और बालिग-नाबालिग होने का कानूनी फ़र्क़ उन्हें अपराध करने और न्याय को मैनेज करने से रोकने में अधिकांशतः असफल ही साबित होगा।
(10) हमारी जांच एजेंसियां और अदालतें आज विपरीत-लिंगी बलात्कार के बेशुमार मामलों को ही समय से सुलझा नहीं पातीं, तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जब समाज में समलैंगिकता के चलन को बढ़ावा मिलेगा, तो समलैंगिक बलात्कारों के नए-नए मामलों का बोझ भी जांच एजेंसियों और अदालतों पर आने लगेगा। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि पहले से ही चरमराई हुई न्याय व्यवस्था और चरमरा जाएगी।
(11) जैसे-जैसे समलैंगिकता का चलन बढ़ेगा, समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों या पति-पत्नी संबंधों पर इसके दुष्परिणाम दिखाई देने लगेंगे। अनेक मामलों में परिवारों के टूटने का भी खतरा रहेगा। समाज में समलैंगिक पति से परेशान पत्नियों और समलैंगिक पत्नियों से परेशान पतियों की संख्या में इजाफ़ा होगा।
(12) आने वाले दिनों में अगर समलैंगिकों को शादी-ब्याह और बच्चे गोद लेने के अधिकार भी दे दिए गए, तो भारतीय परिवार-व्यवस्था चरमरा जाएगी। भारत को अमेरिका बनाने की साज़िश रचने वाले लोगों को इसकी परवाह नहीं है, लेकिन हमको और आपको तो इसकी परवाह होनी चाहिए।
(13) पोर्न साहित्य और वीडियो का दायरा और कारोबार बढ़ेगा, जिससे समाज, खासकर युवा-वर्ग पर इसका काफी बुरा असर पड़ सकता है।
(14) एड्स समेत कई तरह के यौन रोगों का दायरा भी समाज में बढ़ने का अंदेशा है।
(15) इतना ही नहीं, आने वाले समय में अनेक लोगों को समलैंगिक बलात्कार के झूठे आरोप लगाकर भी फंसाया जा सकता है, जैसे कि अभी विपरीत-लिंगी बलात्कार के मामले में फंसाए जाने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
(16) बलात्कार को अब सिर्फ़ बलात्कार लिखने से काम नहीं चलेगा। उसे समलैंगिक या विपरीत लिंगी बलात्कार में डिफाइन करना पड़ेगा, जैसे कई बार मुझे इस लेख में इन शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने प्रगतिशीलता दिखाने के चक्कर में देश को दुर्गतिशीलता और नैतिक-चारित्रिक-सांस्कृतिक पतन की तरफ ढकेल दिया है। इसलिए इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ मैंने Dissent नाम के Safety Valve का इस्तेमाल किया है।
रिव्यू पीटीशन डाले या फैसले को पलटे सरकार!
साथ ही, स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवादी मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली देश की सरकार से मेरी अपील है कि भारत के सामने संस्कृति से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न आकर खड़ा हो गया है। ऐसे में या तो आप इस फैसले के ख़िलाफ़ रिव्यू पीटीशन डालिए या फिर इस फैसले को संसद में बिल लाकर निरस्त कीजिए। अगर आपने इस फैसले पर चुप्पी साधी, तो इतिहास आपको माफ़ नहीं करेगा।
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