धारा 497: एक त्रुटिपूर्ण कानून पर सुप्रीम कोर्ट का त्रुटिपूर्ण फ़ैसला!
अभिरंजन कुमार जाने-माने लेखक, पत्रकार व मानवतावादी चिंतक हैं।

शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, पर तुम उसमें फंसना नहीं। बचपन में पढ़ी गई शिकारी और कबूतरों की कहानी का यह सार अपने दिमाग में फिर से उतार लीजिए और अपने जीवनसाथी को भी न फंसने के लिए आगाह कीजिए।

व्यभिचार को सुविचार मानने वाले अपने अनेक दोस्तों-परिचितों-रिश्तेदारों (चाहे स्त्री हों या पुरुष) से अब आपको ज़रा सतर्क रहना और परहेज करना पड़ सकता है, क्योंकि कल को अगर कोई बात हो गई, तो आपको कानून से सहारा भी नहीं मिलेगा और आप कानून को अपने हाथ में भी नहीं ले सकते।

कानून में जाएंगे तो कानून आपसे कहेगा कि यह क्रिमिनल नहीं, सिविल मामला है, इसलिए या तो हालात से आंखें मूंद लो या फिर जीवनसाथी से तलाक लेने के लिए अर्जी डाल दो। अगर क्रिमिनल मामला चलवाना है तो फिर आत्महत्या या आत्महत्या की कोशिश जैसा कोई कदम उठाओ, फिर हम सोचेंगे।

अगर आप हालात से आंखें मूंद लेंगे तो न तो आपका जीवनसाथी पटरी पर आएगा, न ही वह घुसपैठिया, जिसने आपके जीवन को तबाह किया है। उल्टा वे दोनों अपने विवाहेतर संबंध को यथावत रखेंगे, क्योंकि उन्हें रोकने वाली कोई चीज़ कानून में रह नहीं गई है।

अगर आप छाती पर पत्थर रखकर, अपने सारे संस्कारों, परंपराओं, मान्यताओं, जीवनसाथी के लिए प्रेम, अपने बच्चे/बच्चों (यदि हों) के लिए ज़िम्मेदारी और समग्रता में अपने और पूरे परिवार के हितों को सूली पर टांगकर कहेंगे कि ठीक है तलाक ही दे दो, तो कानून आपको सालों-साल इतना पकाएगा कि आप शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से बर्बाद भी हो सकते हैं। पुलिस, वकील और अन्य संबंधित लोग आपको लूट खाएंगे।

तलाक बाबाजी का प्रसाद नहीं है कि आप जाएंगे और आपकी हथेली पर रख दिया जाएगा। फिर तलाक ले-लेकर आप अगर दूसरे-तीसरे-चौथे संबंध में जाते भी रहे, तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि आपके साथ सब कुछ अच्छा ही होगा।

जहां तक व्यभिचारी जीवनसाथी या घुसपैठिए के ख़िलाफ़ क्रिमिनल मामला चलवाने के लिए आत्महत्या या आत्महत्या की कोशिश जैसा कोई कदम उठाने की बात है, तो इसकी सलाह न कोई आपको देगा, न इस विकल्प को आजमाने के बारे में आपको सोचना चाहिए।

 

सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में सुनाए जाते हैं ऐसे त्रुटिपूर्ण फैसले

एक त्रुटिपूर्ण कानून यानी धारा 497 को निरस्त करने का फैसला भी उतना ही त्रुटिपूर्ण है। अनेक पुरुषों को चिंता है कि व्यभिचार के अपराध नहीं रहने से बड़ी संख्या में महिलाएं व्यभिचारिणी हो जाएंगी। अनेक महिलाओं को चिंता है कि इससे पुरुषों को व्यभिचार करने के लिए और खुली छूट मिल जाएगी।

सच्चाई यह है कि इससे पुरुषों और स्त्रियों दोनों को व्यभिचार की खुली छूट मिलेगी और इससे दोनों ही प्रभावित होंगे- बराबर संख्या में। क्योंकि हर व्यभिचार में एक स्त्री और एक पुरुष बराबर-बराबर शामिल होते हैं और विवाह-संबंध से बाहर सेक्स तलाशने वाली हर व्यभिचारिणी के घर में एक पीड़ित पति और हर व्यभिचारी के घर में एक पीड़ित पत्नी हो सकती है।

हां, जहां तक असर की बात है तो समाज में व्यभिचार बढ़ने का सबसे अधिक खामियाजा स्त्रियों को भुगतना पड़ेगा, क्योंकि व्यभिचार को अपराध के दायरे से बाहर निकालने से अपराधों का जो नया बाज़ार गर्म होगा, उसकी धाह महिलाओं को ही अधिक लगेगी, क्योंकि

(1) परिवार में जो कमज़ोर होगा, उस पर इसका बुरा असर अधिक पड़ेगा और व्यावहारिक स्थिति फिलहाल महिलाओं की ही कमज़ोरी की तरफ़ इशारा करती है।

(2) दुर्भाग्य से व्यभिचारी पति द्वारा परित्यक्त पत्नी के लिए उस संबंध से निकलकर अपना जीवन दोबारा बसा पाना उतना आसान नहीं होगा, जितना कि एक व्यभिचारिणी पत्नी द्वारा परित्यक्त पुरुष के लिए।

(3) एक तरफ जहां व्यभिचारी पति का विरोध करने पर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ सकती है, वही व्यभिचारिणी पत्नी की हत्या के मामले भी बढ़ सकते हैं।

(4) महिलाओं और पुरुषों  दोनों में आत्महत्या और आत्महत्या की कोशिश के मामले बढ़ेंगे। एक तो पुरुषों की तुलना में  महिलाएं ऐसे कदम अधिक उठा सकती हैं, दूसरे अगर महिला आत्महत्या  या आत्महत्या की कोशिश करती है तब भी और अगर पुरुष ऐसा करता है, तब भी महिलाएं ही अधिक पीड़ित होंगी।

(5) व्यभिचारी मानसिकता के पुरुषों के लिए हर विवाहित महिला एक सेक्स ऑब्जेक्ट बन जाएगी और वे किसी भी तरह उसे बरगलाकर, बहकाकर, दबाव डालकर, ब्लैकमेल करके उसे फंसाने में जुट जाएंगे।

(6) पुरुष इस स्वच्छंदता की आड़ में बलात्कार भी कर सकते हैं, लेकिन आम तौर पर महिलाएं ऐसा नहीं कर सकतीं।

(7) अपराध बढ़ने से पहले से ही करोड़ों मामलों के बोझ से दबी देश की न्याय व्यवस्था का हाल और भी बुरा हो सकता है।

यह भी एक विडंबना (Irony) ही है कि याचिकाकर्ता ने इसे पुरुषों से भेदभाव वाला कानून माना था और सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्त्रियों से भेदभाव वाला कानून मानते हुए स्त्रियों की समानता के सिद्धांत का ढोल पीटा और कहा कि पत्नी पति की संपत्ति नहीं है।

एक अटपटे कानून के संदर्भ में इस तरह के अटपटे फैसले तब आते हैं, जब जस्टिस लोग सस्ती लोकप्रियता और इतिहास रचने के लिए जल्दबाज़ी में फैसले सुना देते हैं।

 

भारत में अचानक सेक्स की इतनी बातें साज़िश का संकेत?

आजकल अचानक भारतीय कोर्ट की नज़र में दो लोगों के बीच सेक्स-संबंध इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि लोगों के जीने-खाने से ज़्यादा चिंता उसे उनकी सोने की आज़ादी को लेकर होने लगी है।

पुरुष को पुरुष से, स्त्री को स्त्री से और दोनों को दोनों से सेक्स करने के लिए खुला छोड़ने (धारा 377) के बाद उसने व्यभिचार को अपराध मानने से इनकार कर दिया है। यानी देश के लाखों-करोड़ों घरों में एक तरह की घुसपैठ कराने का इंतज़ाम कराते हुए पति और पत्नी दोनों को विवाह-संबंध में रहते हुए भी प्रकारांतर से दूसरों के पतियों और पत्नियों को बहकाने, बरगलाने, फंसाने, उन्हें इस्तेमाल करने, उनके साथ संबंध बनाने और उन्हें हड़पने के लिए खुला छोड़ दिया है। आने वाले समय में अगर विवाहेतर संबंध घर-घर की कहानी बन जाएं, तो कोई हैरानी नहीं।

अचानक सेक्स की इतनी चर्चा के पीछे कई ऐसे कारण हो सकते हैं, जिनकी हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते। एक दौर में लगभग हर दो-चार साल में भारत की लड़कियों को विश्व सुंदरी और ब्रह्मांड सुंदरी का खिताब मिलने लगा था। उस दौर में अनेक मल्टी-नेशनल कंपनियों को भारत के बाज़ार में तरह-तरह के प्रोडक्ट्स लेकर आना था।

आज पूरी दुनिया में सेक्स और पोर्न का बाज़ार बेहद व्यापक रूप ले चुका है। सेक्स के लिए टूरिज़्म तक ज़ोर पकड़ चुका है। यह बाज़ार करोड़ों-अरबों डॉलर का, अथवा इतना बड़ा हो सकता है जिसका हम और आप अंदाज़ा तक नहीं लगा सकते। इसलिए, भारत को भी बड़े पैमाने पर सेक्स और पोर्न बिजनेस के लिए खोलने और तैयार करने की साज़िश है।

याद रखिए, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों से भारत केवल एक ओपेन सेक्स कंट्री ही नहीं, बल्कि ओपेन सेक्स मंडी भी बन जाएगा।

 

सेक्स ज़रूरत तो है, पर मृग-तृष्णा है!

यहां यह समझना ज़रूरी है कि सेक्स व्यक्ति की ज़रूरत होते हुए भी एक मृग-तृष्णा है। जिस तरह से भीषण गर्मी में मृग अपनी प्यास बुझाने के लिए मरीचिका (मृग-मरीचिका) के पीछे दौड़ता रहता है और उसकी तृष्णा (प्यास) नहीं बुझ पाती, उसी तरह सेक्स है।

सेक्स एक नशा भी है। बिल्कुल शराब की तरह। इसीलिए, “शराब और शबाब” एक ऐसा फ्रेज बनाया गया, जिसमें दोनों साथ-साथ हैं। सेक्स में जितना डूबेंगे, शराब की तरह इसकी भी आपको लत लगती जाएगी, लेकिन संतुष्टि कभी नहीं मिलेगी। जिस तरह शराब की लत आपको बर्बाद कर सकती है, वैसे ही सेक्स की लत भी आपको जीते जी जहन्नुम में ढकेल सकती है। इसकी लत आपको तरह-तरह के अपराधों में भी ढकेल सकती है।

सेक्स की लत कितनी भयानक होती है, इसका अंदाज़ा आप इस एक पौराणिक कहानी से लगा सकते हैं कि राजा ययाति ने पूरी जवानी अय्याशी करने के बाद बुढ़ापा आने पर अपने बेटों तक से जवानी मांग ली थी।

इसलिए सेक्स अगर नियंत्रित ही रहे तो बेहतर। लेकिन इसे अनियंत्रित रूप में बढ़ावा देने की साज़िश रची जा रही है, जिसका शिकार बड़े पैमाने पर हमारे देश के बच्चे-बड़े, स्त्री-पुरुष सभी होने वाले हैं।

 

कानून का संबल नहीं रहा तो खाप जैसे पाप बढ़ेंगे!

सवाल यह भी है कि आज़ादी की बात करने वाले लोग अनुशासन को कैसे दरकिनार कर सकते हैं? आज़ादी बिना अनुशासन के हो सकती है क्या? संविधान में केवल नागरिकों के अधिकार ही तो नहीं बताए गए हैं, कर्तव्य भी तो बताए गए हैं। फिर परिवार में साथ रहने के लिए, एक-दूसरे को वफ़ा का भरोसा दिलाकर साथ चलने के लिए प्रतिबद्ध लोगों की एक-दूसरे के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी?

कोर्ट को affidavit दो और उसका उल्लंघन करो तो अपराध, लेकिन समाज को सबके सामने सात फेरे लेकर या निकाह कबूल करके या अन्य तरीकों से affidavit दो और उसका उल्लंघन करो तो कोई अपराध नहीं? और तो और, अगर कोई एक तरफ अपने जीवनसाथी को दगा दे, दूसरी तरफ दूसरे दम्पती के जीवन में ज़हर घोलने का काम करे, तो भी कोई अपराध नहीं?

किसी कानून की वकालत हम सिर्फ़ इसलिए नहीं करते क्योंकि सारे लोगों को जेल भेज देना चाहते हैं, क्योंकि कानून का मकसद लोगों को केवल सज़ा देना और जेल भेजना भर नहीं होता।

इसलिए व्यभिचार के अपराध रहने से कितने लोगों को जेल होती थी, यह इस प्रावधान की प्रासंगिकता का पैमाना नहीं हो सकता। समाज अक्सर इसका इस्तेमाल व्यभिचारी को जेल भेजने के लिए नहीं, बल्कि इसका डर दिखाकर उसे सही रास्ते पर लाने के लिए किया करता था। सरकारी नौकरी में रहने वाले आर्थिक रूप से सक्षम और अति-सुरक्षित पुरुष अक्सर इस कानून के डर से व्यभिचारी संबंधों में पड़ने से हिचकते थे, कि कहीं उनकी नौकरी न चली जाए।

लेकिन आज समाज के सामने व्यभिचारी को रोकने के लिए कोई सहारा या शक्ति नहीं रह गई है। कानून के होने से लोगों में भरोसा रहता है कि कोई है हमारी सुनवाई करने के लिए। अगर उसे लगेगा कि हमारी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है, तो वे कानून हाथ में लेने लगेंगे। भीड़ अपने तरीके से इंसाफ़ करने लगेगी। खाप जैसे पाप बढ़ेंगे और इनका सबसे ज़्यादा नुकसान उन महिलाओं का ही होगा, जिनके अधिकारों और समानता की बड़ी-बड़ी बातें करके फैसले दिए जा रहे हैं।

जो बात कोर्ट की नज़र में भी अनैतिक है, उसे अपराध बनाए रखने में समस्या क्या है? अपराध आखिर होता क्या है? प्रकारांतर से अनैतिक कृत्य ही तो अपराध हैं।

 

विवाह को लिव-इन-रिलेशन और परिवार को कोठा मत बनाइए!

इसलिए, भारतीय परिवार और विवाह व्यवस्था को छिन्न-विच्छिन्न करने और इसके प्रति लोगों में संदेह और असंतोष पैदा करने की साज़िशों के बीच हमको-आपको इसपर भरोसा बनाए रखना होगा।

हमारी परिवार और विवाह व्यवस्था इतनी लचीली है कि समय के साथ उसने पुरुषों और महिलाओं को हर प्रकार से समानता के अवसर देने के रास्ते खोले हैं और दिए भी हैं। आज महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर, यहां तक कि उनसे आगे निकलते हुए भी काम कर रही हैं और परिवार या विवाह की व्यवस्था इसमें कहीं से भी आड़े नहीं आ रही।

इसलिए जिन लोगों ने भी भारतीय समाज और संस्कृति को ध्वस्त करने के इरादे से विवाह की गरिमा को कम करके इसे लिव-इन-रिलेशन जैसा और परिवार को कोठे जैसा बनाने की साज़िश रची है, इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा। जो लोग विवाह-बंधन की पवित्रता को नहीं समझते, वही इसे वासना की आग में झोंकने का प्रयास कर रहे हैं।

धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 को ख़त्म कर व्यभिचार को अपराध के दायरे से मुक्त करने के फैसले के दूरगामी परिणाम कितने ख़तरनाक हो सकते हैं, यह तुरंत आपको समझ में नहीं आएगा, लेकिन धीरे-धीरे विवाहेतर सेक्स-संबंधों की वजह से समाज में तरह-तरह के यौन-अपराध बढ़ेंगे, यहां तक कि रेप की घटनाएं भी बढ़ेंगी। आरोप लगने पर रेप को सहमति से बनाया गया संबंध बताया जा सकता है और पीड़ित के लिए यह साबित करना कभी भी आसान नहीं होगा कि उसकी सहमति नहीं थी।

अभी तक विवाहित स्त्री से रेप करने पर उसकी सहमति जैसे बहाने बनाकर कर भी आप कानून से नहीं बच सकते थे, लेकिन अब बच सकेंगे, यदि स्त्री इसमें अपनी असहमति नहीं साबित कर पाई।

इस देश में कानूनी स्थितियों का दुरुपयोग करने वालों की तादाद कम नहीं है। समाज में सभी लोग एक समान ज़िम्मेदार, एक समान परिपक्व, एक समान भले नहीं होते। उन्हें नियंत्रित रखने के लिए कानून की ज़रूरत होती है।

खेत में पानी रोकने के लिए मेड़ बनाना पड़ेगा। मेड़ केवल बंधन नहीं है। यह उच्छृंखल जलधारा को बर्बाद होने से बचाना भी है। अगर कोर्ट को इस मेड़ की ज़रूरत समझ में नहीं आती, तो फिर समाज यह मेड़ बनाएगा। और जब समाज मेड़ बनाएगा तो आपके अनेक कानून टूटेंगे, जिससे कि एक भयावह परिस्थिति जन्म ले सकती है।

इतना ही नहीं, अगले 20-30-40 साल में परिवार और विवाह-व्यवस्था के अस्तित्व पर गंभीर संकट पैदा हो जाएगा।

इसलिए कानून को तर्कसंगत बनाते हुए व्यभिचार के लिए स्त्रियों और पुरुषों दोनों के लिए सज़ा का प्रावधान होना चाहिए था।

 

कोर्ट कानून बना नहीं सकता तो उसे ख़त्म करने का अधिकार भी उसे नहीं हो!

मेरी राय में कोर्ट को अगर कानून बनाने का अधिकार नहीं है, तो उसे कानून ख़त्म करने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए। सही स्थिति यह हो कि देश की संसद ही कानून बनाए और वही किसी कानून को ख़त्म करे। सुप्रीम कोर्ट केवल संविधान और कानून की उचित व्याख्या और उसके अनुपालन के लिए है।

क्या यह बेहतर नहीं होता कि जिस तरह से कोर्ट ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के मामले में कानून बनाने की ज़िम्मेदारी संसद पर छोड़ दी, उसी तरह इस मामले में भी उसी से कहता कि या तो कानून को सुधारो या फिर इसे ख़त्म करो।

ख़ासकर तब, जबकि सरकार ने कोर्ट में कहा भी कि मामला लॉ कमीशन के पास है और सरकार इस पर ज़रूरी सुधार करने के लिए तैयार है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने इंतज़ार करने का धैर्य नहीं दिखाया।

देश की अदालतों में 3.3 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या 10 साल से भी अधिक समय से लंबित मामलों की है। कोर्ट को अगर इन मामलों में इंसाफ़ सुनिश्चित कराने की हड़बड़ी नहीं है, तो फिर इस मामले में इतनी क्या हड़बड़ी थी? यह तो कोई ऐसा मामला भी नहीं था, जिसपर अविलंब फैसला ज़रूरी था।

कोर्ट अगर संविधान की “मनमानी व्याख्या” करे तो?

यह सवाल मैं इसलिए उठा रहा हूं, क्योंकि यदि किसी कानून के व्यावहारिक पहलुओं और दूरगामी प्रभावों की उचित समझ के बिना केवल संविधान के सैद्धांतिक पहलुओं की “मनमानी व्याख्या” के आधार पर अगर कानून बनने और निरस्त होने लगें, तो समाज में असंतोष बढ़ जाएगा और लोकतंत्र और भारत की आत्मा मर जाएगी।

यहां “मनमानी व्याख्या” शब्दयुग्म का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि जिस धारा 497 को अभी असंवैधानिक करार दिया गया है, उसे पहले अनेक मौकों पर संवैधानिक करार दिया जा चुका है। यहां तक कि इस बार इसे असंवैधानिक करार देने वाले पांच जजों में से एक जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ भी 1985 में इसे संवैधानिक करार दे चुके थे।

जब स्वयं सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में किसी कानून को संवैधानिक और दूसरे फैसले में असंवैधानिक कहता है, तो स्पष्ट है कि उसकी कोई एक व्याख्या गलत है, क्योंकि संविधान तो वही है, यह उसकी व्य़ाख्या है जो सीधे 180 डिग्री की पलटी मार रही है, यानी “मनमानी” है। यानी कि जज भी गलत हो सकते हैं, जजों की बेंच भी गलत हो सकती है और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले भी गलत हो सकते हैं।

इसीलिए, मेरे मन में यह तकनीकी पहलू उठा कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्याख्या करे, कानूनों की समीक्षा करे, संविधान के आईने में कानूनों की अनुपालना सुनिश्चित करे, लेकिन जब उसे लगे कि कोई नया कानून बनना चाहिए या किसी मौजूदा कानून को निरस्त होना चाहिए, तो अपने ऑब्ज़र्वेशन के साथ उस मामले को उसे संसद को रेफर करना चाहिए।

 

पति-पत्नी तलाक झेलें और घुसपैठिया व्यभिचार कर चलता बने?

व्यभिचार अपराध था और आगे भी रहना चाहिए। यह सोच से परे है कि व्यभिचार अपराध नहीं रहेगा। अब सरकार को या तो रिव्यू पीटीशन डालना चाहिए या फिर नया कानून बनाना चाहिए।

अगर पति-पत्नी की अंदरूनी वजहों से विवाह-संबंध में दरार पड़ती है, तो यह सिविल मामला हो। लेकिन अगर किसी तीसरे व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, के अनधिकृत अनैतिक प्रवेश की वजह से इसमें संकट पैदा होता है, तो यह क्रिमिनल मामला ही रहना चाहिए, नहीं तो परिवार इतने बड़े पैमाने पर टूटेंगे, जिसका आप अभी अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

आप यह मत सोचिए कि सारे विवाहेतर संबंध केवल पति और पत्नी के बीच ख़राब रिश्तों की वजह से ही बनते हैं और सारे विवाहेतर संबंध एक-दूसरे को सहारा देने के लिए ही बनते हैं। यह भी मुमकिन है कि विवाहेतर संबंध की वजह से ही पति और पत्नी के रिश्ते खराब हो जाएं और यह भी संभव है कि जिस व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) की वजह से संबंध ख़राब हो, उसने सुनियोजित तरीके से उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए अथवा केवल अपनी मौज-मस्ती के लिए ही उनके आपसी जीवन में घुसपैठ की हो।

एक स्थिति मैं आपके सामने रखता हूं। एक पति और पत्नी के बीच एक तीसरा व्यक्ति आ जाए, तो कोर्ट के नए फैसले के मुताबिक पति और पत्नी के बीच तो तलाक की परिस्थिति पैदा हो जाएगी, लेकिन वह तीसरा व्यक्ति व्यभिचार करके चलता बनेगा। उसकी न कहीं कोई ज़िम्मेदारी बनेगी, न कोई अपराध बनेगा, न सज़ा मिलेगी, न पश्चाताप करने की कोई परिस्थिति बनेगी। इन तीन व्यक्तियों के त्रिकोण में दो व्यक्तियों का जीवन तबाह हुआ, लेकिन तीसरे व्यक्ति का क्या हुआ? क्या कोर्ट के लिए यह सोचने का विषय नहीं है? कोर्ट किस बुनियाद पर इस तीसरे व्यक्ति को बख्श देना चाहता है?

 

पति और पत्नी के अधिकार पूरी तरह एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं हो सकते!

आपको यह भी देखना होगा कि पति और पत्नी के अधिकार पूरी तरह एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं हो सकते। उनकी ज़िम्मेदारी है एक-दूसरे के अधिकारों के हिसाब से अपने अधिकार तय करना। चार और स्थितियां आपके सामने रखता हूं।

मान लीजिए चार व्यक्ति हैं-

  1. A- एक पति
  2. B- A की पत्नी
  3. C- एक दूसरा पति
  4. D- C की पत्नी

अब इनमें से अगर पति A ने D से अथवा B ने C से विवाहेतर संबंध कायम कर लिए, तो

(1) इस स्थिति में कोर्ट चार लोगों में से विवाहेतर संबंध कायम करने वाले दो लोगों के प्रति नरम है, लेकिन उन बाकी दो लोगों की उसे कोई चिंता नहीं है, जो अपने वैवाहिक संबंध में वफादार बने हुए हैं और जिन्हें अपने-अपने जीवनसाथी की ज़रूरत है। कोर्ट जिन दो के प्रति नरम है, उनकी उच्छृंखला या स्वतंत्रता अन्य दो लोगों के हितों और अधिकारों की कीमत पर आ रही है। कोर्ट उनके अधिकारों को कैसे सुनिश्चित करेगा, उन्हें कैसे बचाएगा या उन्हें कैसे संरक्षण देगा? क्या उन दोनों के बारे में सोचना कोर्ट की ज़िम्मेदारी नहीं?

(2) एक दूसरा प्रश्न यह भी है कि अगर A अथवा B में से कोई एक विवाहेतर संबंध में चला गया, यानी इनमें से किसी एक ने व्यभिचारी संबंध कायम कर लिया, तो अब इसका नतीजा यह होगा कि तलाक जब भी होगा, तो दोनों के बीच होगा। यानी प्रभाव दोनों पर पड़ेगा, जबकि गलती एक की है। इतना ही नहीं, जिसकी गलती है, उसपर प्रभाव कम पड़ेगा, क्योंकि वह पहले ही विवाहेतर संबंध में है। लेकिन जिसकी गलती नहीं है, उसपर प्रभाव अधिक पड़ेगा, क्योंकि वह अब भी अपने जीवनसाथी के प्रति वफ़ादार है। जिसकी गलती नहीं है, क्या उसकी सुरक्षा और उसके अधिकारों के बारे में सोचना कोर्ट की ज़िम्मेदारी नहीं है?

(3) व्यभिचार अगर अपराध नहीं है, तो उसके बारे में चाहे जो भी कहिए, व्यावहारिक स्थिति यही बनेगी कि यह स्वीकार है। और अगर यह स्वीकार है तो इसके मामले बढ़ेंगे। और अगर इसके मामले बढ़ेंगे, तो ऐसे बच्चों की संख्या भी बढ़ेगी, जो माता या पिता किसी एक या दोनों के व्यभिचारी संबंधों की वजह से ख़तरे में पड़ जाएंगे। कोर्ट व्यभिचारी माता या पिता के कथित समानता या स्वायत्तता या निजता के अधिकार के लिए चिंतित है, लेकिन उन बच्चों के अधिकारों की चिंता क्या उसने दिखाई? क्या उन बच्चों के बारे में सोचना सुप्रीम कोर्ट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं?

(4) अगर कोई बच्चा व्यभिचारी संबंध से पैदा होगा, मसलन A और D अथवा B और C से, तो वह बच्चा किसकी ज़िम्मेदारी होगा? क्या पत्नी D का उसे अपने मौजूदा पति C पर, या पत्नी B का उसे अपने मौजूदा पति A पर थोपना उचित है? यदि हां, तो पति A अथवा पति C के अधिकारों का क्या हुआ? यदि नहीं, तो इस व्यभिचारी संबंध की उलझन में उस बच्चे का क्या होगा, जो इस व्यभिचारी संबंध से पैदा हुआ? क्या कोर्ट को व्यभिचारी संबंध से पैदा हुए इस बच्चे के जीवन और अधिकारों के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

कुल मिलाकर, व्यभिचार को अपराध-मुक्त करने से अनेक ऐसे सवाल पैदा हो जाएंगे, जिनसे अनेक लोगों के अधिकार प्रभावित होते हैं। व्यभिचार करने वाली स्त्री या पुरुष को निजता की आज़ादी वफ़ादार रहने वाली स्त्री या पुरुष के स्वाभाविक अधिकारों की कीमत पर दी जा रही है।

 

विवाह सिर्फ़ एक स्त्री और पुरुष का दैहिक संबंध भर नहीं!

विवाह सिर्फ एक स्त्री और एक पुरुष का दैहिक संबंध भर नहीं होता। यह दो आत्माओं का मिलन और जन्म-जन्मांतर का रिश्ता होता है। इसमें दो परिवार भी मिलते हैं और इससे बच्चे भी पैदा होते हैं।

एक व्यभिचारी व्यक्ति के कथित समानता या स्वायत्तता या निजता के अधिकार के लिए आप कितने अन्य लोगों के अधिकारों से खिलवाड़ करना चाहते हैं?

आपको इस बात की चिंता है कि अगर दो बालिग लोग सेक्स करने के लिए सहमत हैं, तो उन्हें यह काम कैसे न करने दिया जाए, लेकिन आपको इस बात की चिंता नहीं है कि दो बालिग लोगों ने आपसी सहमति से ही विवाह किया है, जिस पर आप कुठाराघात कर रहे हैं।

मैं भी मानता हूं कि दो बालिग लोग अगर सेक्स करने के लिए सहमत हैं तो कर लें, लेकिन उनके ऐसा करने से किसी अन्य के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए या किसी अन्य के साथ उनका कमिटमेंट नहीं टूटना चाहिए। इसलिए अगर वे वैवाहिक संबंध में हैं, तो पहले उस वैवाहिक संबंध को तोड़ें, फिर दूसरे संबंध में जाएं।

जैसे, अगर हिन्दू विवाह की हम बात करें, तो इसमें सात फेरे अपने आप में एक मुकम्मल धार्मिक रस्म भी हैं। इसमें एक लड़की और एक लड़का पंडितों-पुजारियों सहित भरे समाज के सामने वैदिक मंत्रोच्चारों के बीच अग्निदेवता के सात फेरे लेकर एक-दूसरे को सात “वचन” देते हैं। इनमें सातवां “वचन” इस प्रकार है-

परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या!

यानी इस “वचन” में लड़की लड़के से यह “वचन” मांगती है कि आप पर-स्त्री को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के बीच अन्य किसी को भागीदार नहीं बनाएंगे।

जब लड़का उसे यह “वचन” देता है, तभी विवाह पूर्ण होता है। मेरे देश की न्यायपालिका महान है, लेकिन क्या संविधान की आड़ में वह इन सात “वचनों” की पवित्रता को महत्वहीन बना सकती है? और जब “वचन” शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो क्या इसकी गरिमा और पवित्रता को उसने ठीक से समझा है? भारत के पवित्रतम ग्रंथों में से एक रामचरितमानस में कहा गया है-

 रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाए, पर वचन न जाई।

इसलिए पति-पत्नी के संबंध में न्यायपालिका को मालिक-मालकिन या चल-अचल संपत्ति जैसी संकीर्ण व्याख्या नहीं करनी चाहिए। पति और पत्नी के अधिकार पूरी तरह एक-दूसरे से स्वतंत्र हो ही नहीं सकते।

 

भारत को भारत की आत्मा के हिसाब से चलने दीजिए!

इसलिए व्यभिचार कोई सुविचार नहीं हो सकता और यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए ही ग़लत है। सुधार की प्रक्रिया में हम इस तरफ नहीं जा सकते कि यह दोनों के लिए ही सही है।

इसलिए व्यभिचार कानून को जेंडर न्यूट्रल किया जाना चाहिए। इसमें महिला और पुरुष दोनों को ही शिकायत करने का अधिकार होना चाहिए और शिकायत सही पाए जाने पर दोषी महिला और पुरुष दोनों को सज़ा भी मिलनी चाहिए।

हमें परिवार और विवाह को मज़बूती प्रदान करने के बारे में सोचना चाहिए, न कि उसकी जड़ों में मट्ठा डालकर उसे बर्बाद कर देना चाहिए। अगर परिवार बर्बाद होने लगे तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को ही होगा, जिनके बारे में अधिक चिंता जताई जा रही है।

साथ में वे बच्चे भी बुरी तरह से प्रभावित होंगे, जिन्हें एक तरह से इग्नोर कर दिया जा रहा है। और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के नाम पर दी गई व्यवस्था से पुरुष सबसे कम प्रभावित होंगे और वही इसका सबसे ज़्यादा दुरुपयोग भी करेंगे।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है-

 परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो। उसमें बहुत कुछ हैजो जीवित है, जीवन दायक है, जैसे भी हो ध्वंस से बचा रखने लायक है।

भारत में कोई व्यवस्था तो भारत की आत्मा के हिसाब से रहने दीजिए। हर बात में विदेशी उदाहरण पेश करके हमारी मौलिक संस्कृति और व्यवस्था को क्षति मत पहुंचाइए। इसलिए, मेरी गुज़ारिश है कि सु्प्रीम कोर्ट और सरकार पूरे मामले पर दोबारा विचार करें।

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