अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए हमें क़ातिल नहीं बनना चाहिए!
अभिरंजन कुमार देश के जाने-माने पत्रकार, कवि व मानवतावादी चिंतक हैं।

एक आदरणीय के फेसबुक पोस्ट से पता चला कि मकर संक्रांति के अगले दिन “कुलीन” कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के घर में बकरे काटे जाया करते थे। बाद में, जैनियों के दबाव में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने तिल का बकरा काटना शुरू किया। उनके मुताबिक इसे “ब्राह्मणों की बकर-चौथ (सकट चौथ)” कहा जाता है।

हालांकि कन्नौज इलाके के आसपास के कुछ ब्राह्मणों ने जहां इस जानकारी को सही माना है, वहीं कई कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने ऐसी किसी परंपरा के अस्तित्व से ही इनकार किया है। चूंकि व्यक्तियों से वाद-विवाद में उलझना कभी मेरा मकसद नहीं रहता, इसलिए यहां उन आदरणीय का नाम लेने से बच रहा हूं, लेकिन प्रवृत्तियों और अंध-परम्पराओं पर चोट करने के अपने मकसद से पीछे नहीं हट सकता, इसलिए मैं कटने-काटने की इस सर्व-धर्म-व्यापी अंध-परंपरा और यहां तक कि प्रतीकात्मकता पर भी उंगली उठाना चाहता हूं।

सवाल है कि धरती के ये धार्मिक लोग इस कटने-काटने वाली प्रतीकात्मकता से बाहर नहीं निकल सकते क्या? कटना-काटना अगर पुण्य-दायक है, तो इस वक्त दुनिया में सबसे ज़्यादा पुण्य आईसिस कमा रहा है। इसलिए चाहे कान्यकुब्ज ब्राह्मण हों या हमारे मुस्लिम भाई-बहन या किसी अन्य समुदाय के हमारे प्यारे भाई-बंधु… वे बकरे काटने वाली इस बकरापंथी सोच से बाहर निकलें। धर्म और परंपरा के नाम पर अधर्म और हिंसा का अंध-समर्थन हमें शैतानों की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

इस संदर्भ में मैं अपने जैनी भाइयों-बंधुओँ को सलाम करता हूं, जो इस अति-हिंसक दुनिया में भी अहिंसा का झंडा बुलंद करते रहते हैं। जो मित्र मेरे लेखों पर लगातार नज़र रखते हैं, उन्हे याद होगा कि मुंबई मीट बैन वाले विवाद के समय भी मैंने अपने जैनी भाइयों-बहनों का समर्थन किया था और कुछ हिन्दूवादी संगठनों समेत उन तमाम संगठनों की आलोचना की थी, जो मीट बैन का विरोध कर रहे थे।

बेज़ुबान पशु-पक्षियों पर हिंसा के समर्थन में अक्सर लोग यह पुराना और घिसा-पिटा तर्क देते रहते हैं कि “मांसाहारी लोग ही इस दुनिया में इको बैलेंस कायम रखते हैं।” इसके जवाब में मेरा बस इतना ही कहना है कि इस तर्क से तो हमें यह भी मान लेना चाहिए कि हिंसावादी लोग ही दुनिया की बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण बनाए रखते हैं।

मेरा ख्याल है कि प्रकृति अपना संतुलन स्वयं बनाए रखती है, इसलिए मेरे मांसाहारी भाईयों-बहनों को यह मुग़ालता पालना बंद कर देना चाहिए कि वही हैं, जो प्रकृति का संतुलन बनाए रखे हुए हैं। मेरा मानना है कि जो ज़ुल्म आइसिस बेगुनाह आदमियों पर कर रहा है, वही ज़ुल्म हमें बेगुनाह पशु-पक्षियों पर नहीं करना चाहिए, वरना उसमें और हममें कोई फ़र्क़ नहीं रह जाएगा।

ईश्वर, अल्लाह, गॉड- चाहे जिसे भी मानें आप, उसने यह धरती सिर्फ़ इंसानों के लिए नहीं, सभी जीव-जंतुओँ के लिए बनाई है। इसलिए अपने खाने-पीने की आज़ादी के लिए हमें किसी भी जीव-जंतु का जीने का अधिकार नहीं छीनना चाहिए। जो दुनिया के संवेदनशील लोग हैं, वे तो हरे-भरे वृक्ष तक को काटने से मना करते हैं।

इसलिए, अगर हमें इस दुनिया में दया, ममता और इंसानियत का झंडा बुलंद रखना है, तो पशु-पक्षियों के जीने की आज़ादी के बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा, क्योंकि अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए हम क़ातिल नहीं बन सकते।