
एमजे अकबर भारत के उन पत्रकारों में रहे, सत्ता के गलियारों में जिनकी तगड़ी घुसपैठ 30-35 साल की उम्र में ही ही हो गई थी। राजीव गांधी के करीबी पत्रकार माने जाते थे, इसलिए राजनीति में शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की।
राजीव गांधी के पीएमओ में संयुक्त सचिव रहे वजाहत हबीबुल्लाह ने दावा किया था कि कुख्यात शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए एमजे अकबर ने ही राजीव गांधी को राज़ी किया था।
अगर यह सच है तो एम जे अकबर के ख़िलाफ़ पहला #MeToo” मामला शाहबानो की तरफ से और शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलटे जाने से जिन लाखों मुस्लिम महिलाओं का अहित हुआ, उनकी तरफ से दायर किया जाना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य कि तब मीटू कैम्पेन भी नहीं था और देश में सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इस रूप में नहीं था।
मज़ेदार बात यह है कि शाहबानो के मामले में मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 लाकर सुप्रीम कोर्ट का 1985 का फैसला पलटने के लिए बीजेपी लगातार ही कांग्रेस पर हमलावर रही है।
शाहबानो मामले में राजीव गांधी को गाइड करने के बाद एमजे अकबर ने 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ा। वे पैदा हुए पश्चिम बंगाल के तेलिनीपाड़ा में, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए चुनी एक दूसरे राज्य बिहार की एक ऐसी सीट – जहां मुसलमान वोटरों की आबादी 70% से भी अधिक है – किशनगंज की सीट।
उपरोक्त दो घटनाएं इस बात की सबूत हैं कि एक बुद्धिजीवी और पत्रकार की छवि रखते हुए भी एमजे अकबर, अगर व्यावहारिक जीवन में नहीं भी, तो कम से कम शुरुआती राजनीतिक जीवन में अवश्य ही एक कट्टरपंथी और प्रतिगामी मुसलमान रहे होंगे। यहां यह डिस्क्लेमर दे दूं कि हिन्दू या मुसलमान होना बुरा नहीं है, लेकिन कट्टरपंथी और प्रतिगामी होना एक हिन्दू के रूप में भी बुरा है और एक मुसलमान के रूप में भी बुरा है।
बहरहाल, लोकसभा चुनाव 2014 से ठीक पहले मार्च 2014 में एमजे अकबर औपचारिक तौर पर एक हिन्दूवादी पार्टी यानी बीजेपी में शामिल हुए और उसके प्रवक्ता बने। फिर बारी-बारी से झारखंड और मध्य प्रदेश से बीजेपी ने उन्हें अपना राज्यसभा सांसद भी बनाया। और 2016 में विदेश राज्य मंत्री भी बन गए। बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों ने उनमें ऐसा क्या देखा, इस पर से पर्दा उन्हें ज़रूर हटाना चाहिए।
32 साल पहले शाहबानो और लाखों मुस्लिम महिलाओं के #MeToo से बच गए एमजे अकबर अब अनेक जातियों-धर्मों की 15-16 महिलाओं के #MeToo आरोपों में फंस गए हैं। यहां मेरा डिस्क्लेमर यह है कि जब तक इन मामलों की मुकम्मल जांच नहीं हो जाती और आरोपों की सच्चाई सामने नहीं आ जाती, तब तक मैं एमजे अकबर को न दोषी मानता हूं, न निर्दोष मानता हूं, केवल आरोपी मानता हूं।
यह भी एक अजीब इत्तिफ़ाक है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” की धारणा वाले देश में जिन दिनों नौ दिन की नारी-शक्ति पूजा चल रही हो, उन्हीं दिनों एमजे अकबर स्त्री शक्ति के निशाने पर आए हैं। इसलिए मैं इन आरोपों को चुनाव से जोड़कर नहीं, नवरात्रि से जोड़कर देखना चाहता हूं।
पिछले साल अमेरिका में #MeToo कैम्पेन की शुरुआत करने वालों ने कोई 2019 के भारतीय चुनाव को ध्यान में रखकर यह कैम्पेन शुरू नहीं किया होगा कि इसे 2018 के अंत में भारत पहुंचाना है और एमजे अकबर नाम के एक भारतीय मंत्री की बलि लेनी है। भारत में इसकी शुरुआत अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अपने मामले में आवाज़ उठाकर की है, जिसके बाद अलग-अलग महिलाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों की बीसियों हस्तियों के ख़िलाफ़ ऐसी आवाज़ें उठाई हैं। यह बात मेरे गले नहीं उतरती कि एक एमजे अकबर को लपेटने के लिए इतने सारे लोगों को लपेटा गया होगा।
इसलिए, एमजे अकबर कसूरवार हैं या बेगुनाह, इस सवाल पर कोई अनधिकृत जजमेंट दिए बिना यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि कम से कम मुझे इस मामले में कोई राजनीति नहीं दिखाई दे रही। मानहानि की बात भी फिजूल है, क्योंकि लोग अब इतने परिपक्व ज़रूर हो चुके हैं कि उन्हें पता है कि जब तक व्यक्ति पर गुनाह सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक उसे गुनहगार नहीं माना जा सकता। लेकिन कोई व्यक्ति पद का फायदा उठाकर गुनाह छिपाने में कामयाब न हो जाए, इसके लिए पदत्याग ज़रूरी है।
बहरहाल, अगर यह देश और इस देश की सरकारें स्त्री-सुरक्षा और कार्यस्थलों पर यौन-शोषण रोकने के लिए गंभीर हैं, तो उन्हें देश को एक मज़बूत संदेश देना होगा। देश में नारी-शक्ति की पूजा चलते हुए भी अगर सरकार यह संदेश देने से चूक जाएगी, तो स्त्रियों को सचमुच ऐसा लगेगा कि उसे देवी का रूप केवल उसका भावनात्मक शोषण करने के लिए दिया गया है, न कि उसे कोई वास्तविक शक्ति देने के लिए।
हिन्दू संस्कृति की बात करने वाले मेरे प्यारे भाइयों-बहनों को यह नहीं भूलना चाहिए कि चाहे महिषासुर हो या रावण या कौरव- इन सबको स्त्रियों पर बुरी नज़र डालने या उनके साथ बदसलूकी करने के कारण ही दंडित होना पड़ा। रामायण की पूरी लड़ाई सीता के अपहरण के कारण और महाभारत की पूरी लड़ाई द्रोपदी के चीरहरण के कारण हुई। महिषासुर भी इसीलिए मारा गया, क्योंकि वह महिलाओं पर बुरी नज़र डालता था।
इसलिए, एमजे अकबर को मंत्रिपद से हटाने से नहीं, उन्हें नहीं हटाने से गलत मिसाल कायम होगी। क्या मेरे देश की सरकार इस बात को समझ रही है?और अगर नहीं समझ रही, तो कृपया “अकबर” का नाम बदलकर “बीरबल” कर दें, ताकि लोग स्वतः ही मान लें कि अब वे पवित्र हो गए हैं।
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