
पाकिस्तान और आतंकवाद से निपटने के लिए दीर्घकालीन स्पष्ट नीति की ज़रूरत है। इस नीति का अभाव इस देश की सभी सरकारो में रहा है। मुमकिन है कि मोदी सरकार भी अपवाद न हो, लेकिन महज तीन साल पुरानी सरकार को हम इसके लिए अधिक दोष दे भी नहीं सकते, न ही कुछ तात्कालिक घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि 70 साल से जो समस्या चली आ रही है, उसका समाधान करने में यह सरकार सक्षम है कि नहीं।
पाकिस्तान से निपटने के लिए सरकार क्या रणनीति बना रही है, यह ऐसा विषय नहीं है, जिसके बारे में हर रोज़ मीडिया में कमेंट्री की जाए कि आज हमने यह तीर मारा, कल यह तीर मारने वाले हैं। कुछ तो विरोधी दलों द्वारा 56 इंच की छाती को ललकारे जाने की वजह से और कुछ संभवतः स्वयं भी राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा से पहले ही सरकार ने 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक का ज़रूरत से ज़्यादा ढिंढोरा पीटा। इसलिए, आगे न सिर्फ़ उसे अपने पुरुषार्थ का बखान करने में संयम दिखाना चाहिए, बल्कि विपक्ष, मीडिया और आम जन को भी बार-बार उसके पुरुषार्थ को ललकारने से बचना चाहिए।
अभी हम लोग क्या चाहते हैं कि पाकिस्तान ने एक घटना की, तो भारत भी उसके जवाब में फौरन एक घटना करे। फिर पाकिस्तान दूसरी घटना करे, तो भारत भी दूसरी घटना करे। पाकिस्तान तीसरी घटना करे, तो भारत भी तीसरी घटना करे। हमारे राजनीतिक दलों, मीडिया और आम जन की अपरिपक्व सोच का दूसरा पहलू यह भी है कि हम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई तभी चाहते हैं, जब उसकी तरफ़ से कोई घटना हो। अगर किसी ख़ास वक्त में उसकी तरफ़ से कोई घटना न हो, तो हम तुरंत भाव-विह्वल होकर उसके साथ क्रिकेट, संगीत, व्यापार, आवागमन सारे रिश्ते जोड़ लेना चाहते हैं।
यानी हम चाहते हैं कि भारत सिर्फ़ पाकिस्तान को जवाब दे, लेकिन पहल करके उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करे। ऐसे तो यह समस्या कभी हल नहीं होगी। पाकिस्तान बार-बार हमें थप्पड़ मार कर भाग जाएगा और हर बार हम उसके पीछे-पीछे दौड़ते रहेंगे। फिर अगर हमने उसे पकड़ भी लिया, तो चार दूसरे लोग बीच-बचाव करके मामले को रफ़ा-दफ़ा करा देंगे। हम फिर से दोस्ती का राग अलापने लगेंगे और पाकिस्तान फिर किसी दिन हमें थप्पड़ मारकर भाग जाएगा। हम फिर उसे पकड़ने दौड़ेंगे।
अगर इस स्थिति से बचना है, तो सही मौका देखकर किसी दिन हमें भी उसकी पुरजोर पिटाई करनी होगी, चाहे उस दिन उसकी तरफ़ से प्रोवोकेशन हुआ हो या नहीं। तभी उसके मन में डर पैदा होगा। फिर, जैसे इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को आज़ाद कराया, वैसे ही हम सिंध और बलूचिस्तान को भी आज़ाद कराने के लिए समयबद्ध नीति बनाकर चुपचाप या खुल्लम-खुल्ला, जो भी उचित हो, काम करें। साथ ही, पीओके को किस तरह वापस भारत के कब्जे में लिया जाए, इसपर भी काम करें, क्योंकि हम यह महसूस करते हैं कि पाकिस्तान भले कश्मीर से दावा छोड़ने को तैयार नहीं है, लेकिन संसद के सर्वसम्मत प्रस्तावों के बावजूद आम भारतीय मन ही मन पीओके को पाकिस्तान का ही मान चुका है।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि पाकिस्तान हर युद्ध हारकर भी भारत के प्रति लगातार आक्रामक रहता है, जबकि सारे युद्ध जीतकर भी भारत पाकिस्तान के प्रति डिफेंसिव रहता है। वहां का हर नेता, हर सेना अधिकारी खुले तौर पर कहता है कि कश्मीर में आज़ादी की लड़ाई चल रही है और हम उसे अपना समर्थन देते रहेंगे, फिर भी भारत न जाने किस भुलावे में उससे आतंकवाद रोकने की गुहार लगाता रहता है। भई, जब वह खुले तौर पर कह रहा है कि वह इसे आतंकवाद मानता ही नहीं, तो स्पष्ट है कि वह इसे नहीं रोकेगा। वह इसलिए भी नहीं रोकेगा, क्योंकि उसे पता है कि हम उसका कुछ नहीं कर सकते। और जब तक हम कुछ नहीं करेंगे, तब तक दुनिया के अन्य देश भी कुछ नहीं कर सकते।
हम इसलिए कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि 1965 और 1971 में पाया हुआ हम गंवा चुके हैं। तब से अब तक दोनों देशों के सामरिक समीकरण बदल चुके हैं। पाकिस्तान अब एक परमाणु-शक्ति संपन्न देश है और आतंकवादी देश भी। जब कोई परमाणु-शक्ति वाला आतंकवादी किसी को भी परमाणु हमले की धमकी दे, तो चिंता तो हो ही जाती है। हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। हमारा एजेंडा तरक्की करना है। लेकिन वह एक सांप्रदायिक देश है। उसका एजेंडा संप्रदाय के लिए मरना-मारना है। जिस विचार की बुनियाद पर वह मुल्क पैदा हुआ है, उसमें लोग मरने-मारने के लिए ही पैदा होते हैं। जब किसी की सोच ही यह बन जाए कि एक मरेंगे, दो पैदा होंगे, तो आप उसका क्या कर सकते हैं?
भारत-पाक समस्या में और भी कई पेंच हैं। भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश बना, लेकिन पाकिस्तान एक मुस्लिम देश बना। भारत ने अपने देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की और उसे बराबरी का अधिकार देकर आगे बढ़ने के तमाम मौके दिए। लेकिन पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, बराबरी और तरक्की सुनिश्चित नहीं की गई। नतीजतन, भारत में जहां अल्पसंख्यक फले-फूले, उनकी राजनीतिक ताकत बढ़ी, व्यवस्था और अर्थव्यवस्था में उनका दखल बढ़ा, वहीं पाकिस्तान में अल्पसंख्यक साफ़ कर दिये गये। 15 प्रतिशत से घटते-घटते आज उनकी आबादी केवल 3 प्रतिशत रह गई है।
नतीजा, आज पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ कुछ भी करे, वहां इसका विरोध करने वाले लोग नाम मात्र के ही हैं। लेकिन यदि भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एक छोटा-सा कदम भी उठाना चाहे, तो यहां बड़ी संख्या में लोग इसका विरोध शुरू कर देते हैं। हम अपने कश्मीर में एक आतंकवादी मार गिराएं, तो पाकिस्तान इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना देता है, लेकिन पाकिस्तान में लाखों-करोड़ों अल्पसंख्यक मार डाले गये, उनके पूजा-स्थल ध्वस्त कर दिए गए और उनका धर्म छीन लिया गया, हम कभी इसका प्रतिकार तक नहीं कर सके। अगर इतना भी कर पाए होते, तो आज वहां भी अल्पसंख्यकों की आबादी 15 से 20 प्रतिशत होती और उनकी भी राजनीतिक ताकत इतनी होती कि वे सरकार और नीतियों को प्रभावित कर सकते। फिर, भारत के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने में पाकिस्तान को भी एक हज़ार बार सोचना पड़ता।
यानी आप मानें न मानें, भारत और पाकिस्तान के बीच की यह समस्या दो संप्रदायों की अलग-अलग सोच और उनके बीच का संतुलन बिगड़ते चले जाने की वजह से भी विकराल हुई है। जब संप्रदाय के आधार पर बंटवारा हुआ, तो संप्रदायों के बीच का संतुलन भी बिगड़ने नहीं देना चाहिए। यह संतुलन जितना बिगड़ेगा, समस्याएं उतनी बढ़ेंगी। आज स्थिति यह है कि किसी के भी पास जादू की वह छड़ी नहीं है, जिसे घुमाकर भारत-पाकिस्तान के बीच की दिक्कतों को अचानक से ख़त्म कर दे।
इसलिए, हर घटना पर तात्कालिक प्रतिक्रिया की मांग करने वाले लोग तीन चीजें तय करें-
- आख़िर पाकिस्तान का हमें करना क्या है? उसके साथ नाच-गाना चलाना है, या फिर दोनों देशों की जनता, स्थायी हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र और मानवता के व्यापक हित में इसके विखंडन की नीति पर काम करना है?
- किसी भी सूरत में यदि परमाणु युद्ध की नौबत बन गई, तो क्या हम उसके लिए तैयार हैं? क्या हम पहले परमाणु हमला कर सकते हैं? क्या हम पाकिस्तान की तरफ़ से संभावित परमाणु हमले को रोक सकते हैं?
- और, जब भी हम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ठोस कदम उठाना चाहेंगे, तो भारत के अंदर जो प्रो-पाकिस्तान लॉबी या सेंटीमेंट है, उसे कैसे समझाएंगे और इसके लिए कैसे तैयार करेंगे?
जिस दिन ये तीन चीजें हम पक्के तौर पर तय कर लेंगे, उस दिन से पाकिस्तान से आ रही मुश्किलें अपने आप कम होना शुरू हो जाएंगी।
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