जातिवाद, क्षेत्रवाद, हिंसा और बंटवारे का दूसरा नाम बन गई है कांग्रेस
अभिरंजन कुमार जाने-माने लेखक, पत्रकार और मानवतावादी चिंतक हैं।

देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में जो व्यक्ति कांग्रेस की आलोचना करता है, उसे भक्त, संघी, भाजपाई, पक्षपाती इत्यादि कहकर हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है और अछूत बनाने की कोशिश की जाती है, लेकिन ज़रा हाल-फिलहाल के कुछ तथ्यों पर ग़ौर कीजिए और अगर ये ग़लत हैं तो इनका प्रतिवाद कीजिए-

1. कांग्रेस नेताओं ने पहले गुजरात में बिहारियों, उत्तर प्रदेशियों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काई और हज़ारों लोगों का विस्थापन कराया। शायद उन्हें लगता हो कि इससे गुजराती उनके पक्ष में आ जाएंगे। लेकिन चित भी मेरी पट भी मेरी की तर्ज पर अब वे इसके लिए गुजरात की भाजपा सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए बिहारियों और उत्तर प्रदेशियों को भड़काने का प्रयास करेंगे कि देखो भाजपा शासित राज्यों में आपकी क्या हैसियत है? शायद उसे लगता है कि इससे बिहारी और उत्तर प्रदेशी भी उसके पक्ष में आ जाएंगे।

2. कांग्रेस ने पहले एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण सरकार को दलित-विरोधी बताया, दलितों को भड़काया, उसके गुस्से को हवा दी। शायद उसे लगा होगा कि इससे दलित उसके पक्ष में आ जाएंगे। फिर जब दबाव में आकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया, तो कांग्रेस ने कैम्पेन छेड़कर भाजपा को सवर्ण विरोधी बताना और नोटा अभियान चलाना शुरू कर दिया। शायद उसे लगता है कि इससे सवर्ण उसके पक्ष में आ जाएंगे।

3. कांग्रेस ने गुजरात में पटेलों, राजस्थान में गुर्जरों और हरियाणा में जाटों के आरक्षण आंदोलन को न सिर्फ़ हवा दी, बल्कि उसे हिंसक रूप दिया, जिसकी वजह से अनेक लोगों की जानें गईं और खरबों की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा। इन हिंसक जातीय आरक्षण आंदोलनों में कांग्रेस की भूमिका को प्रमाणित करने के लिए आज किसी सबूत की भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि आप देख सकते हैं कि इन हिंसक आंदोलनों के तमाम नेता किस पार्टी की गोदी में बैठे हैं।

4. एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने को पंडित, जनेऊधारी ब्राह्मण, शिवभक्त इत्यादि कहलवा रहे हैं, शायद उन्हें लगता हो कि इससे भाजपा के हिन्दुत्व का नारा छीनकर वे तमाम हिन्दुओं को अपने पक्ष में कर लेंगे। लेकिन दूसरी तरफ कर्नाटक चुनाव से पहले कांग्रेस ने लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग करके अल्पसंख्यक दर्जा देने का सांप्रदायिक शिगूफा छेड़ा। शायद उसे लगा हो कि इससे सारी हिन्दू-विरोधी ताकतें उसके पक्ष में आ जाएंगी।

5. बीजेपी की गाय-पॉलिटिक्स का हमने कभी समर्थन नहीं किया, लेकिन देखिए कि बीजेपी की निंदनीय गाय-पॉलिटिक्स का जवाब कांग्रेस की तरफ से जिस तरह से आता है, वह भी कतई वंदनीय नहीं है। कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कहते हैं कि अब तो मैं गाय ज़रूर खाऊंगा। केरल के कांग्रेसी गाय और बछड़ों के मांस के साथ जुलूस निकालते हैं। गाय के लिए आदमी को मारना निस्संदेह गलत है, लेकिन वोट के लिए गाय को मारना क्या सही है? गाय कोई भाजपा का मुद्दा है क्या? गाय के लिए तो 1857 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सिपाही विद्रोह हो गया। क्या अंग्रेज़ सेक्युलर थे और सिपाही विद्रोह करने वाले सांप्रदायिक?

6. 2002 के गुजरात दंगे के दाग से हमने बीजेपी को कभी भी मुक्त नहीं किया, लेकिन इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने वाली कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अगर 1984 के सिख-विरोधी दंगों में कांग्रेस की भूमिका से साफ़ मुकर जाते हैं, तो इसे संवेदनहीनता, ग़ैरज़िम्मेदाराना सोच और अपने पाप के लिए प्रायश्चित न होने के अलावा और क्या कहा जा सकता है?

7. कांग्रेस अध्यक्ष जब आइसिस जैसे आंतकवादी संगठनों को बेरोज़गार युवकों की फ़ौज और आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी संगठन को आतंकवादियों की फ़ौज बताते हैं, तो इस विध्वंसकारी बंटवारे की कुतर्की राजनीति के बारे में लोगों की क्या राय बनेगी?

ऐसे अनेक उदाहरण हो सकते हैं, लेकिन उपरोक्त सभी उदाहरण हाल-फिलहाल के हैं। अतीत में जाने की ज़रूरत ही नहीं है। क्या ये सारे कांड करना मोदी की नीतियों का विरोध करना है या देश में जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता, आतंकवाद और अलगाववाद की आग को भड़काना है?

भाजपा को सांप्रदायिकता के आरोप से मैं कभी बरी नहीं करता, लेकिन इन्हीं वजहों से मैं कांग्रेस को उसकी तुलना में अधिक विघटनकारी मानता हूं। यह बात सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसने 1947 में भारत-पाकिस्तान का बंटवारा कराया, बल्कि इसलिए कि उसके बाद से भी वह लगातार देश में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर ही चलती आई है।

जिस तरह कश्मीर से साढ़े तीन लाख पंडितों को मार-मार कर खदेड़ दिया गया, अगर वैसे ही कांग्रेस आज गुजरात या किसी भी अन्य राज्य से बिहारियों, उत्तर प्रदेशियों या देश के किसी भी अन्य राज्य के लोगों को खदेड़कर भगाना चाहती है, तो इसका समर्थन हम नहीं कर सकते।

हां, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र निर्माण सेना की ऐसी सियासत की भी हम उतनी ही निंदा करते हैं, जितनी कि इस वक्त कांग्रेस की इस सियासत की निंदा कर रहे हैं।

यह देश सभी 130 करोड़ लोगों का है। हममें से अनेक लोग एक जगह से दूसरी जगह जाकर ही देश के निर्माण में अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं। मैं भी एक बिहारी भारतीय हूं और अगर कोई भी राजनीतिक पार्टी हमारी इस अस्मिता को ललकारेगी, तो हमें उसका पुरज़ोर प्रतिकार करना होगा।

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