एक सर्व-सुविधा-संपन्न ICU स्वनामधन्य संपादकों के मानसिक उपचार के लिए भी बने
अभिरंजन कुमार जाने-माने लेखक, पत्रकार और मानवतावादी चिंतक हैं।

बिहार के मुज़फ्फरपुर और आसपास के ज़िलों में हर साल गर्मी के मौसम में मासूम बच्चों पर कहर बरपाने वाली बीमारी एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम को लेकर हर कोई सवालों के घेरे में है- केंद्र सरकार, बिहार सरकार, स्थानीय प्रशासन, अस्पतालों का प्रशासन और यहां तक कि आज इसपर हो-हल्ला मचा रहा मीडिया भी।

मीडिया इसलिए, क्योंकि मीडिया भी तभी जागता है, जब हमारे सौ-पचास बच्चे असमय काल के गाल में समा जाते हैं। इससे पहले किसी भी बड़े मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर इन इलाकों के हालात और आसन्न ख़तरे को लेकर प्रायः कोई रिपोर्टिंग देखने को नहीं मिलती। यूं भी गरीबों के दो-चार बच्चे कहीं मर जाएं, तो मेनस्ट्रीम मीडिया हाउसेज़ के लिए यह तूल देने लायक ख़बर नहीं होती, क्योंकि इन ख़बरों से टीआरपी नहीं आती।

भारतीय मीडिया के द ग्रेट संपादकों को लगता है कि सैफ अली ख़ान के बेटे तैमूर का अंगूठा चूसना भी एक महान ख़बर है और शाहरुख ख़ान की बेटी की एक झलक पर तो ग़रीबों की सौ-सौ बेटियां भी कुर्बान की जा सकती हैं। इन संपादकों के टेलीविज़न ज्ञान के मुताबिक,

 सुबह को आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि लोग उस वक्त सोकर उठे होते हैं, नाश्ता करते-करते टीवी देखते हैं, गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत देखकर उनका ज़ायका बिगड़ सकता है।

 दोपहर को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त सास-बहू नाम और थीम वाले मनोरंजक कार्यक्रमों का होता है। आम तौर पर उस वक्त मिडिल क्लास घरेलू महिलाएं टीवी देख रही होती हैं। उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे, तो सास-बहुओं के कुटिलता भरे हथकंडे दुनिया के सामने नहीं आ पाएंगे।

 शाम को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त प्रमुख पार्टियों के प्रवक्ताओं और हिन्दू-मुस्लिम प्रतिनिधियों के बीच चिल्ला-चिल्ली कराने और टीवी स्टूडियो में हाथापाई के अभ्यास का होता है। उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे, तो देश का लोकतंत्र ही ख़तरे में पड़ जाएगा।

 रात को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त लोगों के डिनर करने का होता है। लोग अच्छी-अच्छी ख़बरें देखकर चैन की नींद सोना चाहते हैं, इसलिए उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे, तो लोगों को बुरे-बुरे सपने आएंगे, वे अनिंद्रा के शिकार हो जाएंगे और अगली सुबह उठेंगे तो ताज़गी महसूस नहीं करेंगे।

यही वजह है कि चाहे बिहार के मुज़फ्फरपुर और आसपास के इलाके हों, या उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और आसपास के इलाके… यहां बच्चों पर बरपने वाले कहर का पता बाकी देश को तभी चल पाता है, जब बीमारी सुरसा राक्षसी की तरह अपना मुंह पूरा खोल चुकी होती है और अनगिनत बच्चों को निगल चुकी होती है।

इन इलाकों में हर साल यह बीमारी फैलती है, लेकिन किसी साल आपने इन इलाकों में बीमारी फैलने से पहले अस्पतालों के प्रबंध का रियलिटी चेक देखा है? या किसी इंटरव्यू में किसी संबंधित नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रशासनिक अधिकारी को इस बात के लिए रगड़े जाते हुए देखा है कि इस बार आपने अमुक बीमारी से बचाव के लिए क्या इंतज़ामात किए हैं?

इसीलिए यह अकारण नहीं है कि इस बार भी जब मुज़फ्फरपुर में बच्चों की मौत का आंकड़ा 100 को पार कर गया है, तब जाकर दिल्ली के कुछ टीआरपी-लोलुप संपादक अपना चेहरा चमकाने और चैनल के लिए टीआरपी बटोरने के मकसद से एसकेएमसीएच (अस्पताल) के आईसीयू में आतंक मचाने पहुंचे हैं। करीब 14 साल से प्रदेश की सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री और केंद्र व राज्य के स्वास्थ्य मंत्रियों को रगड़ने की हैसियत या हिम्मत नहीं है, तो इस त्रासद घड़ी में उन ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को ही रगड़े जा रहे हैं, जो अपने सीमित ज्ञान और सुविधा के हिसाब से मरते हुए बच्चों को बचाने के लिए पल-पल जूझ रहे हैं।

ज़रा इन टीआरपी-लोलुप संपादकों का मानसिक दिवालियापन तो देखिए-

1. ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को रगड़ा जा रहा है कि अस्पताल में डॉक्टरों की कमी क्यों है?

2. ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को रगड़ा जा रहा है कि अस्पताल में बेड की कमी क्यों है और एक-एक बेड पर दो-दो तीन-तीन बच्चों का इलाज क्यों किया जा रहा है?

3. आईसीयू में बच्चों के इलाज में लगे डॉक्टरों और नर्सों को इलाज से भटकाकर उनके साथ डांट-फटकार की जा रही है।

4. जिन बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता पहले ही ख़तरनाक रूप से कम हो चुकी है, उनकी जान से खेलते हुए आईसीयू में पूरे लाव-लश्कर के साथ घुसा जा रहा है, इस बात की परवाह किए बिना कि इससे उन बच्चों में इन्फैक्शन का ख़तरा भी हो सकता है।

5. नेताजी के चमचों को तो रगड़ा जा रहा है कि आप आईसीयू में जूता पहनकर कैसे घुस गए, लेकिन टीआरपी-लोलुप संपादकों को इसी कृत्य के लिए कौन रगड़े?

6. अस्पताल में इलाज की मारामारी के बीच भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की राजनीतिक बहस कराई जा रही है।

7. आईसीयू की पोल-खोलते ऐसे प्रचार-लोलुप संपादक पल-पल अपने वीडियोज़ व्हाट्सऐप ग्रुपों में शेयर करना नहीं भूल रहे और व्यक्तिगत प्रचार में कोई कमी नहीं रह जाए, संस्थान के सोशल और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर इसे भी अपने मातहतों के ज़रिए सुनिश्चित करा रहे हैं।

हालांकि ऐसी बेवकूफ़ाना हरकतें सभी संपादक नहीं कर रहे, बल्कि वही संपादक कर रहे हैं,

 या तो जिनके पास पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री भी नहीं है

 या जो सनसनी-छाप क्राइम शोज बनाते-बनाते हर घटना, दुर्घटना, त्रासदी और मौत में सनसनी ढूंढ़ने के आदी हो गए हैं

 या जिनका चैनल टीआरपी की रेस में काफी पीछे है और नौकरी बचाने के लिए जिनपर टीआरपी लाने का ज़बर्दस्त दबाव है

 या प्राइम टाइम डिबेट्स करते-करते जिन्हें बात-बात पर हल्ला-हंगामा करने की आदत लग चुकी है। इनकी समझ यह है कि जब भी ये किसी को रगड़ते हैं, तो जनता ताली बजाती है।

ये लोग पत्रकारिता की मर्यादा भूल चुके हैं। इनकी मानवीय संवेदनाओं को लकवा मार चुका है। कायदे से एक सर्व-सुविधा-संपन्न आईसीयू तो इन लोगों के मानसिक दिवालियापन के उपचार के लिए भी इस देश में होना चाहिए।

इन स्वनामधन्य संपादकों ने हमें बताया कि मासूमों की लाशों पर केवल सियासत ही नहीं चमकाई जा सकती, बल्कि पत्रकारिता भी चमकाई जा सकती है और अपना चेहरा तो निश्चित रूप से चमकाया जा सकता है।

लब्बोलुआब ये, कि “चमकी” बुखार के कवरेज में भी चेहरा न “चमका”, तो शायद “चमकने” का मौका ये चूक न जाएं! इसीलिए त्रासदी के विकराल रूप धारण करने से पहले ये अपने सियासी आकाओं की चाशनी चाटकर देश में सरकार बनाने-गिराने के खेल में जुटे हुए थे और अब त्रासदी के विकराल रूप धारण कर लेने के बाद ये अपना विकराल मानवीय चेहरा प्रस्तुत करने के लिए बेसब्र हुए जा रहे हैं।