अमृतसर हादसा: तुम कितने रावण मारोगे, घर-घर से रावण निकलेगा!
अभिरंजन कुमार जाने-माने लेखक, पत्रकार और मानवतावादी चिंतक हैं।

नवजोत सिंह सिद्धू पर 1988 में रोड रेज की एक घटना में एक व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डालने का आरोप था। उनके ख़िलाफ़ गैरइरादतन हत्या का मामला भी दर्ज हुआ और 2006 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते हुए 3 साल की कैद भी सुनाई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल मई में उन्हें गैरइरादतन हत्या के आरोप से बरी कर दिया और केवल मारपीट का दोषी माना।

मारपीट की एक घटना, जिसमें एक व्यक्ति की मौत भी हुई, उसमें मारपीट का दोषी पाए जाने पर भी सिद्धू पर केवल 6 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया गया। उस सिद्धू पर, जिनकी प्रतिदिन की आमदनी शायद करोड़ों में हो। भारत में कानून और इंसाफ़ ऐसे ही काम करता है। शायद इसीलिए सिद्धू के ठहाके हर रोज़ टीवी पर गूंजते हैं, और उन्हें हंसते देखकर हम लोग भी गुदगुदाते हैं।

अब 30 साल के बाद सिद्धू की पत्नी की मौजूदगी में अमृतसर में दिल को दहलाने वाली एक ऐसी दुर्घटना हुई है, जैसी किसी रावण दहन कार्यक्रम के दौरान आज तक नहीं हुई होगी। सिद्धू की पत्नी की शान में आयोजक कसीदे पढ़े जा रहे थे कि देखिए आपको देखने के लिए लोग रेलवे ट्रैक पर भी खड़े हो गए हैं, उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं कि ट्रेन आ जाएगी तो क्या होगा।

लेकिन जैसा कि प्रथमदृष्टया प्रतीत हो रहा है सिद्धू की पत्नी ने अपनी शान में इस तरह शेखी बघारने पर न तो आयोजकों को रोका, न दर्शकों को वहां से फौरन हटाने का निर्देश दिया। उल्टे जब एक तेज़-रफ्तार ट्रेन के द्वारा सचमुच ही 60 से अधिक लोग कुचल डाले गए, तो वे फौरन घटनास्थल से गायब हो गईं।

अब देखिए न। कानून का क्या है? जब मारपीट का दोषी पाए जाने के बावजूद व्यक्ति की मौत के लिए सिद्धू पर महज 6 हज़ार रुपये का जुर्माना ही लगाया जा सका, तो सिद्धू की पत्नी का तो कानून बाल भी बांका नहीं कर सकता, क्योंकि सीधे तौर पर उनका तो कोई भी दोष स्थापित नहीं किया जा सकता। पर अंतरात्मा की अदालत में क्या अमृतसर के इस भीषण नरसंहार के लिए सिद्धू की पत्नी कभी बरी हो पाएंगी?

हालांकि इस भीषण नरसंहार के लिए केवल सिद्धू की पत्नी ही नहीं, अन्य अनेक लोग भी दोषी हैं। कार्यक्रम के आयोजकगण से लेकर लापरवाही बरतने वाले प्रशासनिक अधिकारीगण तक। शायद आप रेलवे के कुछ लोगों को भी इस भीषण नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार मानें, लेकिन इस तरह की घटनाओं में पिछला रिकॉर्ड देखते हुए यह तय है कि 60 लोगों की मौत के लिए किसी को कुछ ख़ास सज़ा नहीं मिल पाएगी।

जो 60 ज़िदगियां चली गईं, उनमें से हर जान की कीमत सरकारी मुआवज़े में 5-5 लाख रुपये है। 5 लाख रुपये लीजिए और कृतज्ञ होकर कानून का पालन कीजिए। नहीं तो किसी गुनहगार को सज़ा देने के बजाय कानून आपकी ही छाती पर चढ़कर रावण-दहन करेगी।

जब देश में ज़िम्मेदारी तय करने की व्यवस्था का ऐसा हाल हो, तो लाजिमी है कि हर साल होने वाले रावण दहन के बावजूद साफ बच जाने वाला रावण अट्टहास करे, बिल्कुल जेएनयू-देशद्रोह कांड के देशद्रोहियों की तरह-

“तुम कितने रावण मारोगे

घर घर से रावण निकलेगा।”

हो सकता है कि आपको अतिशयोक्ति लगे, पर अमृतसर में जिन लोगों ने रावण-दहन के कार्यक्रम में सैकड़ों लोगों को रेल-पटरी पर खड़ा कर दिया, उस पटरी पर जिसपर धड़ल्ले से ट्रेनें आती-जाती हों, तो इन लोगों को आज का रावण नहीं तो और क्या कहा जाए?

बहरहाल, 2018 में 1919 की याद आ गई, जब इसी अमृतसर के जलियावाला बाग में अंग्रेज़ अफसर जनरल डायर ने सैकड़ों लोगों को गोलियों से भुनवा दिया था। यह साल जलियावाला बाग नरसंहार का सौवां साल है। इस सौवें साल में अमृतसर में उससे भी भीषण नरसंहार होगा, यह तो सोच और कल्पना से भी परे था।

[text-blocks id=”502″ slug=”%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a1″]

इन्हें भी पढ़ें-