कठफोड़वा तक की बेचैनी समझने वाले कवि केदारनाथ सिंह को श्रद्धांजलि!
अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, कवि और मानवतावादी चिंतक हैं।

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि केदारनाथ सिंह जी की मृत्यु (19 मार्च 2018) की ख़बर मेरे लिए एक अचानक आई ख़बर ही थी, क्योंकि अपनी व्यस्तताओं में ऐसा उलझा कि काफी समय से उनसे बात या मुलाकात नहीं हो पाई थी, इसलिए उनकी हालिया स्वास्थ्य दिक्कतों के बारे में भी जानकारी नहीं थी। हालांकि अपने बीच के किसी भी व्यक्ति के 80 पार कर जाने के बाद ध्यान तो लगा ही रहता है, इसलिए कोई ऐसा हफ़्ता नहीं बीतता होगा, जब अपने चार-पांच वरिष्ठ और आत्मीय लेखकों से मिलने के बारे में नहीं सोचता होऊंगा, लेकिन सोचने-सोचने में ही केदारनाथ सिंह चले गए। यह बात मुझे कचोटती रहेगी।

हिन्दी साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते उनकी कविताओं से मेरी जान-पहचान तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (1994-97) में ही बन गई थी, लेकिन दिल्ली आने (1997) के बाद उनसे व्यक्तिगत जान-पहचान भी बन गई। उन दिनों कई बार उनके घर पर आना-जाना भी हुआ और फ़ोन पर तो अक्सर बातचीत होती रहती थी। जब पटना में था (2011-13), तो अपने चर्चित साक्षात्कार कार्यक्रम “मुंहा-मुंही” में उन्हें बुलाना चाह रहा था, लेकिन पटना वे अत्यंत कम समय के लिए वे आए थे और इसलिए अगली बार आने पर कार्यक्रम में आने का वादा करके चले गए थे।

और 30 मार्च 2007 की यह तस्वीर तो मेरे लिए यादगार है, जब मेरे दूसरे कविता-संग्रह “उखड़े हुए पौधे का बयान” के लोकार्पण में डॉ. नामवर सिंह और डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के अलावा वे भी मंच पर आए। कार्यक्रम लंबा खिंच गया था क्योंकि उसमें दिल्ली में मौजूद करीब-करीब सारे वरिष्ठ साहित्यकार शामिल हुए थे। फिर भी केदारनाथ जी पूरे समय कार्यक्रम में न सिर्फ़ मौजूद रहे, बल्कि किताब और कविताओं की समीक्षा करते हुए एक शानदार भाषण भी दिया। उसमें सिर्फ़ तारीफ़ें ही नहीं थीं, मेरे लिए सीख भी थी।

लेकिन उस कार्यक्रम के थोड़े दिनों बाद जैसे-जैसे अन्य साहित्य-जीवियों से बातचीत होती रही, केदारनाथ जी के लिए मन में सम्मान और बढ़ता चला गया, क्योंकि वरिष्ठ कवि अरुण कमल समेत कई लोगों ने बताया कि जब भी मेरी और मेरी कविताओं की बात चली, केदारनाथ जी ने दिल खोलकर तारीफ़ की। आपके पीछे आपकी तारीफ़ करने वाले लोग हिन्दी साहित्य में भी कम ही हैं, और निस्संदेह केदारनाथ सिंह उन बेहद कम लोगों में से एक थे।

केदारनाथ जी की कविताओं की चर्चा करने के लिए अलग से एक पूरा लेख लिखना पड़ेगा। अपनी कविताओं में वे जिस तरह से नए-नए बिम्ब गढ़ते थे, वह मुझ सहित तमाम अन्य कवियों के लिए सीखने वाली चीज़ है। और उनकी ये पंक्तियां तो अपनी सरलता के बावजूद मेरे हृदय में इस तरह बसी हुई हैं कि मेरे अपने ही मन की अभिव्यक्ति लगती है- “जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में/ कठफोड़वा लौटता है काठ के पास/ ओ मेरी भाषा/ मैं लौटता हूं तुम में/ जब चुप रहते-रहते/ अकड़ जाती है मेरी जीभ/ दुखने लगती है मेरी आत्मा।”

केदारनाथ सिंह जैसी हस्तियां कभी भुलाई नहीं जा सकतीं। हालांकि अपने जीवनकाल में भी उन्हें कम मान-सम्मान न मिला और ज्ञानपीठ व साहित्य अकादमी समेत हिन्दी में कोई ऐसा प्रमुख सम्मान नहीं था, जो उन्हें मिलने से बचा रह गया हो, फिर भी कहा जाता है कि कविता का मोल कवि के न रहने के बाद और अधिक समझ में आता है, इसलिए आने वाले वर्षों और दशकों में निस्संदेह केदारनाथ सिंह की कविताओं की अहमियत और बेहतर समझी जाएगी।

उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि!

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