
कांग्रेस ने कहा है कि महाभियोग नोटिस के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को कामकाज से अलग हो जाना चाहिए। मतलब साफ है कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस के कामकाज में व्यवधान डालना चाहती है। अभी महाभियोग नोटिस स्वीकृत हुआ नहीं, लगाए गए आरोपों की जांच हुई नहीं, आरोप प्रमाणित हुए नहीं, महाभियोग पास हुआ नहीं, पर चीफ़ जस्टिस को कामकाज से अलग हो जाना चाहिए- इसका क्या मतलब है?
देश के आम लोगों के लिए न्याय का सिद्धांत यह है कि जब तक आरोप प्रमाणित नहीं होते, तब तक वह निर्दोष है। फिर देश के चीफ जस्टिस क्या देश के नागरिक नहीं होते? क्या उनके मौलिक अधिकार नहीं होते? क्या उन्हें इंसाफ़ का हक़ नहीं होता? बिना दोषी सिद्ध हुए कुछ लोगों की राजनीति में फंसकर वह कामकाज क्यों छोड़ें? चीफ जस्टिस को कामकाज से हटाकर कांग्रेस क्या हासिल करना चाहती है? उसे देश को बताना चाहिए कि किन मामलों की सुनवाई से वह डरी हुई है कि उसे चीफ जस्टिस को हटाने की इतनी बेसब्री है कि उनके रिटायर होने तक केवल पांच महीने भी इंतज़ार नहीं कर सकती?
ऐसे तो कभी भी कोई भी राजनीतिक दल या नेता लोकसभा में केवल 100 या राज्यसभा में केवल 50 सांसदों के बल पर जजों को डरा सकता है, धमका सकता है, अपने इशारों पर नाचने के लिए बाध्य कर सकता है, काम करने से रोक सकता है, चाहे उसमें आरोप प्रमाणित करने की शक्ति हो या नहीं, चाहे उसमें महाभियोग पास कराने लायक बहुमत हो या नहीं।
कांग्रेस के हिसाब से चलें, तो संविधान और देश की जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भूलकर जज राजनीतिक दलों और प्रभावशाली नेताओं का तुष्टीकरण करने और नौकरी बचाने में ही लग जाएंगे। और अगर देश के जज राजनीतिक दलों और नेताओं का तुष्टीकरण करने लगेंगे, तो देश के 133 करोड़ आम नागरिकों के इंसाफ़ का क्या होगा, जिसका ट्रैक रिकॉर्ड कांग्रेस-रचित कुव्यवस्था के चलते पहले ही काफी ख़राब है।
दरअसल, कांग्रेस प्रारंभ से ही ख़ुद को इस देश का ख़ुदा मानती है। उसने कभी भी किसी भी संवैधानिक संस्था या देश के नागरिकों की कोई औकात नहीं समझी। समय-समय पर अदालतों को तो ख़ास तौर से उसने दबाव में रखने की कोशिश की। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में इमरजेंसी लगाकर लोकतंत्र की हत्या करने का दुस्साहसिक और कलंकित काम भी उसने एक कोर्ट (इलाहाबाद हाई कोर्ट) के फ़ैसले से ही चिढ़कर किया था।
याद कीजिए, सन 1971 से 1975 के बीच का वो दौर। तब तक कांग्रेस लोकतंत्र को अपने डंडे से हांकती चली आ रही थी। चुनाव आयोग की कोई हैसियत नहीं थी और चुनावों को उसने मखौल बना रखा था। साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर, अनेक जातियों और कमज़ोरों को चुनावों में शामिल होने से रोककर, बूथलूट, गिनती में धांधली और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके अनेक जगहों पर वह चुनाव जीतती रही।
लेकिन 1971 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का पाला राजनारायण जैसे जुझारू नेता से पड़ गया। सारे तीन-पांच करके चुनाव तो वह जीत गईं, लेकिन राजनारायण ने इस चुनाव के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख कर लिया। लंबी सुनवाई के बाद जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण के इस आरोप को सत्य पाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था और 12 जून 1975 को उनका चुनाव रद्द करने का फैसला सुना दिया।
कांग्रेस प्रारंभ से ही ख़ुद को इस देश का ख़ुदा मानती है। उसने कभी भी किसी भी संवैधानिक संस्था या देश के नागरिकों की कोई औकात नहीं समझी। समय-समय पर अदालतों को तो ख़ास तौर से उसने दबाव में रखने की कोशिश की। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 25 जून 1975 की आधी रात देश में इमरजेंसी लगाकर लोकतंत्र की हत्या करने का दुस्साहसिक और कलंकित काम भी उसने एक कोर्ट (इलाहाबाद हाई कोर्ट) के फ़ैसले से ही चिढ़कर किया था। फिर 1986 में राजीव गांधी ने भी सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम किया, जब शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अध्यादेश लाकर पलट दिया और उस अबला असहाय स्त्री को तलाक देने वाले पति से गुज़ारा भत्ता तक मिलने न दिया। -अभिरंजन कुमार
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट गईं, लेकिन वहां से भी उन्हें आधी-अधूरी राहत ही मिली। 24 जून 1975 को जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक तो लगा दी, लेकिन संसद में इंदिरा गांधी का वोटिंग अधिकार बहाल नहीं किया। इससे बौखलाई इंदिरा गांधी ने अगले ही दिन यानी 25 जून 1975 की आधी रात को देश में इमरजेंसी लगा दी।
कांग्रेस द्वारा कोर्ट का गला घोंटने का यह सिलसिला 1975 में ही थम गया हो, ऐसा नहीं है। 1986 में इंदिरा गांधी के पुत्र और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने भी सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम किया, जब शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अध्यादेश लाकर पलट दिया और उस अबला असहाय स्त्री को तलाक देने वाले पति से गुज़ारा भत्ता तक मिलने न दिया।
कोर्ट की गरिमा कांग्रेस ने इस देश में कब रहने दी? देश की विभिन्न अदालतों में लंबित करीब तीन करोड़ मामले, मामूली मुकदमों का भी सालों-साल चलते रहना और फिर भी इंसाफ़ की गारंटी न होना- इन सबसे क्या कोर्ट की गरिमा तार-तार नहीं होती? यदि हां, तो इन सबके लिए इस देश में सबसे अधिक ज़िम्मेदार कौन है? आज़ादी के बाद 70 में से 55 साल जिसने राज किया हो, उसे छोड़कर इसके लिए और किसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है?
और आज भी जिस तरह से साज़िशों का जाल बुनते हुए कांग्रेस ने चीफ जस्टिस को निशाने पर लिया है, कोर्ट की गरिमा उसी से गिर रही है। देश में एक आम परसेप्शन बन चुका है कि कांग्रेस और सहयोगी दलों ने चीफ जस्टिस के ख़िलाफ़ चार जजों को सेट किया, ताकि उनके कामकाज पर विवाद और संदेह पैदा करके अयोध्या मुद्दे पर सुनवाई और फैसले को 2019 के चुनाव के बाद के लिए टलवाया जा सके। आखिर यह कौन-सा गरिमापूर्ण तरीका होता है कि अपने सीनियर जज पर आरोप लगाने के लिए आप विपक्षी पार्टियों के नेताओं से मीटिंग करें और प्रेस कांफ्रेंस करके सनसनी पैदा करें?
बहरहाल, वाया मीडिया हम जितना जान पाए हैं, उसके हिसाब से चीफ जस्टिस पर मुख्यतः तीन आरोप लगाए गए हैं-
(1) पहला आरोप है कि चीफ जस्टिस ने प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट मामले में सीबीआई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति नारायण शुक्ला के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की इजाजत नहीं दी। सवाल है कि अदालतों में कितने मामले आते हैं, जिनमें कोर्ट सीबीआई की दलीलों में दम नहीं पाता और यहां तक कि उसकी पूरी की पूरी जांच को भी खारिज कर देता है, फिर एक जज के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने की इजाज़त नहीं देना क्या इतना बड़ा मुद्दा हो गया कि इसके लिए देश के चीफ जस्टिस पर ही महाभियोग शुरू कर दिया जाए? क्या कांग्रेस पार्टी अब चीफ जस्टिस को यह बताएगी कि उन्हें क्या फैसला सुनाना चाहिए और क्या नहीं?
(2) दूसरा आरोप है करीब 35 साल पहले गलत हलफनामा देकर एक ज़मीन हासिल करने का। सवाल है कि अगर दीपक मिश्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, तो कांग्रेस की सरकार में 2011 में सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति कैसे हुई? सुप्रीम कोर्ट आने से पहले वे पटना और दिल्ली उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश क्यों बनाए गए? और अगर तब कांग्रेस को दीपक मिश्रा से दिक्कत नहीं थी, तो अब किन मामलों की सुनवाई के डर से यह दिक्कत पैदा हो गई?
(3) तीसरा आरोप है जजों के रोस्टर में मनमानी करने का। सवाल है कि क्या अब चीफ जस्टिस को राजनीतिक दलों से पूछकर रोस्टर बनाना पड़ेगा? यही क्यों माना जाए कि चीफ जस्टिस रोस्टर लगाने में मनमानी कर रहे हैं? यह क्यों न माना जाए कि उन पर आरोप लगाने वाले चार जज “मनोनुकूल केस” न मिलने से नाराज़ हुए हैं? यह क्यों न माना जाए कि कांग्रेस और सहयोगी दल अनेक मामलों में “मनोनुकूल जज” चाहते हैं, ताकि उन्हें मैनेज किया जा सके और ऐसा न होने पर वे बौखलाए हुए हैं?
ये आरोप कितने खोखले हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि स्वयं कांग्रेस और सहयोगी दलों के अनेक नेता भी इनसे सहमत नहीं हैं और खुलेआम उन्होंने अपनी असहमति का इज़हार किया है। इसलिए, आज महज आरोप लगाकर चीफ जस्टिस को कामकाज से दूर रहने की नसीहत देने वाली कांग्रेस को जवाब देना चाहिए कि
(1) क्या 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कोर्ट में दोषी सिद्ध होने के बाद कुर्सी छोड़ी थी?
(2) क्या 1987 में बोफोर्स घोटाले में आरोप लगने के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कुर्सी छोड़ी थी?
(3) क्या 1993 में सरकार बचाने के लिए सांसदों की ख़रीद-फ़रोख्त का आरोप लगने के बाद प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने कुर्सी छोड़ी थी?
(4) 2004 से 2014 के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में किस मंत्री ने आरोप लगते ही कुर्सी छोड़ दी थी?
ज़ाहिर है, कांग्रेस की मंशा में खोट है और देश के चीफ जस्टिस पर महाभियोग चलाने के लिए न उसके पास पर्याप्त आधार है, न संख्या बल है, न नैतिक बल है। यह देश का दुर्भाग्य है कि अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में कुछ पार्टियों ने आज सुप्रीम कोर्ट को ही अपना शिकार बना लिया।
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