चार वाकये जो बताते हैं कि नरेंद्र मोदी तानाशाह नहीं हैं!
मनोज मलयानिल एबीपी न्यूज़ में वरिष्ठ पत्रकार हैं।

2009 लोकसभा चुनाव में जब लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार थे, तब 2014 के लिए नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाने की वकालत करने वाले अरुण शौरी देश की वर्तमान राजनीतिक हालत से बहुत चिंतित हैं और उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि 2019 तक संविधान को ताक पर रख कर मोदी कहीं शासन व्यवस्था चलाने की राष्ट्रपति प्रणाली ना लागू कर दें। 2014 चुनाव में मोदी के समर्थन में आवाज बुलंद कर चुके शौरी का आरोप है कि देश की संवैधानिक संस्थानों की अहमियत को मोदी सरकार लगातार नकार रही है। अरुण शौरी का एक चैनल पर इंटरव्यू आ रहा था, जिसे देखकर ऐसा लगा मानो उनकी नजर में मोदी एक निरंकुश अथॉरेटेटिव नेता हों, जो किसी की नहीं सुनते हैं और मनमानी चलाते हैं।

प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का करीब तीन साल का कार्यकाल खत्म हो चुका है। इस दौरान कई ऐसी घटनाएं और वाकये हुए, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मोदी के कामकाज का तरीका आक्रामक और अपनी तरह का ज़रूर है, पर पीएम मोदी निरंकुश नेता नहीं हैं। निरंकुश या तानाशाह एक बार जो फैसला ले लेता है, फिर उसे वो वापस नहीं लेता है, पर मोदी ने अपने कई फैसलों को पलटा है।

  1. पहला वाकया आप को याद होगा कि सरकार बनने के कुछ समय बाद ही मोदी ने नया जमीन अधिग्रहण अध्यादेश/कानून बनाने का फैसला लिया था, लेकिन भारी विरोध के कारण उन्होंने किसानों और विपक्ष के सामने झुकना मंजूर किया और फैसले को पलट दिया। मोदी ने भूमि अधिग्रहण को साख की लड़ाई नहीं बनाया।
  2. दूसरा वाकया नरेंद्र मोदी नाम से उकेरे गए सूट वाला है। बराक ओबामा भारत आए हुए थे। ओबामा से एक मुलाकात के दौरान मोदी अपने नाम से उकेरे गए सूट में दिखे। देश की जनता को शायद ये पसंद नहीं आया। राहुल गांधी ने मोदी पर सूट-बूट की सरकार कहकर हमला किया। मोदी ने कुछ ही समय बाद अपनी सूट को नीलाम करने का फैसला ले लिया। तब से आज तक मोदी भारत में कभी सूट में नजर नहीं आए। तानाशाह किस्म के व्यक्ति को अपनी इमेज की इस तरह की चिंता नहीं रहती है।
  3. तीसरा, मोदी ने एक दिन अचानक नोटबंदी का फैसला ले लिया। पीएम के इस फैसले को निरंकुश निर्णय कहा गया, लेकिन आगे चलकर सरकार ने इसमें भी अपने लचीले रुख को दिखाया। पैसे की निकासी और जमा करने को लेकर 50 से ज्यादा बार नियम बनाए और बदले गए। निरंकुश शासक एक बार फैसला ले लेने के बाद फिर अपने निर्णय से टस से मस नहीं होता है।
  4. चौथा, अगर मोदी का वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलाव का कोई इरादा होता, तो अमित शाह ने 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू नहीं कर दी होती। एंटी इनकंबेंसी का मुकाबला करने के लिए बीजेपी किस तरह दक्षिण के राज्यों और पश्चिम बंगाल में उत्तर के राज्यों की संभावित कमी का मुकाबला करने की तैयारी कर रही है, इससे हम सब वाकिफ हैं।

अरुण शौरी ने एक बार कहा था कि राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह का समर्थन करना उनके जीवन की पहली सबसे बड़ी गलती थी और 2014 में मोदी का समर्थन करना जीवन की उनकी दूसरी सबसे बड़ी गलती थी। कहीं अरुण शौरी जिंदगी की तीसरी सबसे बड़ी गलती तो नहीं कर रहे हैं!

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